Immunity and Blood Groups

Immunity and Blood Groups

( 1 ) प्रतिरोधक क्षमता - मानव शरीर हर दिन अनेकों रोगाणुओं से उद्भासित होता रहता है परन्तु फिर भी यह बड़ी आसानी से रोगग्रस्त नहीं होता । इसका प्रमुख कारण रोगाणु उन्मूलन हेतु शरीर में उपस्थित प्रतिरोधक क्षमता है । प्रतिरोधक क्षमता हमें रोगों से लड़ने में मदद करती है ।

( 2 ) हमारे शरीर में पाये जाने वाले प्रतिरक्षात्मक अंग - थाइमस , लसीका पर्व , अस्थि मज्जा , यकृत आदि है ।

( 3 ) प्रतिरक्षा विज्ञान - रोगाणुओं के उन्मूलन हेतु शरीर में होने वाली क्रियाओं तथा सम्बन्धित तंत्र के अध्ययन को प्रतिरक्षा विज्ञान कहा जाता है ।

( 4 ) प्रतिरक्षा विधियाँ दो प्रकार की होती हैं -

( i ) स्वाभाविक प्रतिरक्षा विधि ( Innate defence mechanisin )
( ii ) उपार्जित प्रतिरक्षा विधि ( Acquired defence mechanism )

( 5 ) स्वाभाविक प्रतिरक्षा विधि जन्मजात होती है , इसे अनिर्दिष्ट या प्राकृतिक प्रतिरक्षा भी कहते हैं । स्वाभाविक प्रतिरक्षा विधि के लिए निम्न कारक सहायक होते हैं -

( i ) भौतिक अवरोधक
( ii ) रासायनिक अवरोधक
( iii ) कोशिका अवरोधक
( iv ) ज्वर , सूजन आदि ।

( 6 ) उपार्जित प्रतिरक्षा विधि - यह अनुकूली अथवा विशिष्ट प्रतिरक्षा भी कहलाती है । इस प्रकार की प्रतिरक्षा में एक पोषक किसी विशेष सूक्ष्म जीव अथवा बाह्य पदार्थ के प्रति अत्यन्त विशिष्ट प्रघात करता है । इसी प्रतिरक्षा में प्रतिरक्षियों का निर्माण किया जाता है । यह प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है -

( i ) सक्रिय प्रतिरक्षा
( ii ) निष्क्रिय प्रतिरक्षा

( 7 ) सामान्यतः बाहरी रोगाणु या पदार्थ जिनका आण्विक भार 6000 डॉल्टन या इससे अधिक होता है , वे प्रतिजन के रूप में काम करते हैं ।

( 8 ) प्रतिजन ( Antigen ) - वह बाहरी रोगाणु अथवा पदार्थ है जो शरीर में प्रविष्ट होने के पश्चात् बी - लसिका कोशिका को प्रतिरक्षी उत्पादक प्लाविका कोशिका में रूपान्तरित कर प्रतिरक्षी उत्पादन हेतु प्रेरित करता है तथा विशिष्ट रूप से उस ही प्रतिरक्षी से अभिक्रिया करता है ।

( 9 ) प्रतिरक्षी ( Antibody ) - एक विशिष्ट गामा ग्लोबुलिन प्रोटीन है जो प्रतिजन के साथ संयोजित हो सकते हैं । इनका निर्माण प्लाज्मा कोशिका द्वारा किया जाता है । प्रतिरक्षी में दो भारी व दो ग्लाइकोप्रोटीन हल्की श्रृंखलाएँ होती हैं ।

( 10 ) प्रतिजन - प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया - प्रतिजन विशिष्ट प्रतिरक्षी के साथ संयोजित होकर प्रतिजन - प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया करते हैं ।

( 11 ) प्रतिजन के वे विशिष्ट अंग जो प्रतिरक्षी से जुड़ते हैं , उन्हें प्रतिजनी निर्धारक ( Antigenic Determinant or Epitope ) कहते हैं ।

( 12 ) पेराटोप ( Paratope ) - प्रतिरक्षी का वह भाग जो प्रतिजन से क्रिया करता है , उसे पेराटोप ( Paratope ) कहते हैं ।

( 13 ) प्रतिरक्षी पाँच प्रकार की होती हैं - IgG , lgA , IgD , IgM तथा lgE IgG एकमात्र प्रतिरक्षी है जो प्लेसेन्टा को पार कर भ्रूण तक पहुंच सकती है । इसी प्रकार IgA माँ के दूध में पाये जाने वाला अकेला प्रतिरक्षी है जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है ।

( 14 ) प्रतिरक्षी ' Y ' के आकार की होती है , जो चार संरचनात्मक इकाईयों से बनी होती है । इनमें से दो भारी व बड़ी तथा दो छोटी व हल्की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला होती है ।

( 15 ) रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है , जो गाढा , चिपचिपा व लाल रंग का होता है तथा रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होता है । रक्त प्लाज्मा व रक्त कणिकाओं से बना होता है । कणिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं-

( i ) लाल रक्त कणिकाएँ
( ii ) श्वेत रक्त कणिकाएँ
( iii ) बिम्बाणु

( 16 ) रक्त समूह ( Blood Group ) — सर्वप्रथम वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर ने 1901 में रक्त का विभिन्न समूहों में वर्गीकरण किया । लाल रक्त कणिकाओं के ऊपर पाये जाने वाले प्रतिजन के आधार पर मानव रक्त को A , B , AB तथा O में विभक्त किया गया है ।

( 17 ) O रक्त समूह वाले व्यक्ति को सर्वदाता तथा AB रक्त समूह वाले व्यक्ति को सर्वग्राही कहा जाता है अर्थात् O रक्त समूह वाला व्यक्ति सभी को रक्त का दान कर सकता है तथा AB रक्त समूह वाला व्यक्ति सभी रक्त समूहों का रक्त ग्रहण कर सकता है ।

( 18 ) लाल रक्त कणिकाओं पर Rh कारक ( Rh Factor ) की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर रक्त दो प्रकार का होता है -

( i ) Rh धनात्मक
( ii ) Rh ऋणात्मक

( 19 ) Rh कारक करीब 417 अमीनो अम्लों का एक प्रोटीन है । जिसकी खोज मकाका रीसस नाम के बंदर में की गई थी । यह प्रोटीन मानव की RBC पर पाया जाता है । मनुष्य में Rh कारक पाँच प्रकार के होते हैं । इनमें आरएचडी सबसे प्रमुख है ।

( 20 ) रक्ताधान ( Blood Transfusion )- क ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा रक्त या रक्त आधारित उत्पादों जैसे प्लाज्मा , प्लेटलेट आदि को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के परिसंचरण तंत्र में स्थानान्तरित किया जाता है ।

( 21 ) रक्त के स्रोत के आधार पर रक्ताधान दो प्रकार का होता है -

( i ) समजात आधान ( Allogenic Transfusion ) - ऐसा आधान जिसमें अन्य व्यक्तियों के संग्रहित रक्त का उपयोग किया जाता है ।
( ii ) समजीवी आधान ( Autologous Transfusion ) - ऐसा आधान जिसमें व्यक्ति का स्वयं का संग्रहित रक्त काम में लिया जाता है ।

( 22 ) रुधिर वर्ग का नियंत्रण तीन विकल्पियों ( IA , Ib , तथा Io या i ) के आपसी तालमेल पर निर्भर करता है । मनुष्यों में विकल्पियों की उपस्थिति के आधार पर रक्त निम्न प्रकार का होता है - A , B , AB तथा O ।

( 23 ) रुधिर वर्ग की आनुवंशिकता के कई अनुप्रयोग हैं , जैसे पैतृकता सम्बन्धी विवादों का हल , सफल रक्ताधान , आनुवंशिक रोगों जैसे हीमोफीलिया का इलाज आदि ।

( 24 ) अंगदान ( Organ Donation ) - किसी जीवित या मृत व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति को कोई ऊतक या अंग दान करना अंगदान कहलाता है । अपनी देह को अंग प्रत्यारोपण तथा चिकित्सकीय प्रशिक्षण के लिए दान करना देहदान कहलाता है ।

( 25 ) देहदान की आवश्यकता के दो प्रमुख कारण है -

1 . जरुरतमंद लोगों का अंग प्रत्यारोपण मृत देह से अंगों को निकालकर किया जाता है इस हेतु देहदान की आवश्यकता होती है ।
2 . चिकित्सीय शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों को प्रशिक्षण हेतु मृत देह की आवश्यकता होती है ।

( 26 ) अंगदान दिवस - हर वर्ष 13 अगस्त को भारत में अंगदान दिवस मनाया जाता है । भारत में अंगदान व देहदान कानूनी रूप से वैध है ।


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