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हैदरअली का चरित्र तथा उपलब्धियां

Haidar Ali Important Facts

हैदरअली का प्रारम्भिक जीवन तथा उत्कर्ष हैदरअली मैसूर राज्य का एक पराक्रमी तथा प्रतिभाशाली शासक था । उसके नेतृत्व में 18 वीं शताब्दी में मैसूर राज्य का अत्यधिक उत्थान हुआ ।

हैदरअली का जन्म 1722 ई . में मैसूर राज्य में बुदीकोट नामक स्थान पर हुआ था । उसका पिता फतह मुहम्मद मैसूर राज्य की सेना में एक फौजदार था । युवा होने पर हैदरअली भी एक साधारण सैनिक के रूप में मैसूर राज्य की सेना में भर्ती हो गया । 1755 ई.में हैदरअली को डिण्डीगल का फौजदार बना दिया गया । यहाँ पर उसने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग की शिक्षा देने के लिए अनेक योग्य फ्रांसीसी अधिकारियों को नियुक्त किया । उसने फ्रांसीसी अधिकारियों के निरीक्षण में वहाँ एक तोपखाना स्थापित किया । 1766 में वह मैसूर का स्वतन्त्र सुल्तान बन बैठा ।

हैदरअली द्वारा मैसूर राज्य का विस्तार

हैदरअली एक पराक्रमी तथा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था । वह मैसूर राज्य की सीमाओं का विस्तार करना चाहता था । 1763 ई. में उसने बेदनूर पर अधिकार कर लिया और इस नगर का नाम बदल कर हैदरनगर रखा । बेदनूर की लूट से हैदर को लगभग 12 करोड़ रुपये का माल , सोने - चांदी , हीरे - जवाहरात आदि मिले । उसने दक्षिणी कनारा तथा कालीकट पर भी अधिकार कर लिया । मंगलौर , रायदुर्ग , चिन्तलदुर्ग , गुन्टी आदि पर भी उसका आधिपत्य स्थापित हो गया । उसने कोचीन तथा पालघाट के राजाओं को अपने अधीन किया । उसने श्रीरंगपट्टम को अपनी राजधानी बनाया ।

अंग्रेजों से संघर्ष

दक्षिण में हैदरअली के बढ़ते हुए प्रभाव से अंग्रेज चिन्तित थे । अंग्रेज हैदरअली को अपना प्रबल प्रतिद्वन्द्वी मानते थे और उसकी शक्ति का दमन कर देना चाहते थे । अत : दोनों पक्षों में युद्ध होना स्वाभाविक था ।

प्रथम मैसूर युद्ध ( 1767-69 ई . )

अंग्रेज दक्षिण में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे । वे दक्षिण में हैदरअली की बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित थे और उसकी शक्ति का दमन कर देना चाहते थे । 1766 ई . में अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम तथा मराठों से सन्धियाँ करके हैदरअली के विरुद्ध एक त्रिगुट का निर्माण किया । इस अवसर पर हैदर ने कूटनीति से काम लिया । उसने मराठों को 35 लाख रुपये ( 18 लाख रुपये नकद और 17 लाख रुपये के बदले कोलार जिला ) देकर उन्हें त्रिगुट से अलग कर दिया । कुछ समय पश्चात् 1767 ई . में हैदर ने निजाम से भी सन्धि करके उसे अपने पक्ष में मिला लिया । इस प्रकार हैदरअली ने अपनी कूटनीतिक चतुराई से त्रिगुट को भंग कर दिया ।

1767 ई . में अंग्रेजों और हैदरअली के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया । हैदरअली ने निजाम की सेनाओं को साथ लेकर सितम्बर , 1767 में अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया । परन्तु अंग्रेज सेनापति कर्नल स्मिथ ने हैदरअली तथा निजाम को पराजित कर दिया । इस पर निजाम ने हैदर का साथ छोड़ दिया और अंग्रेजों के पक्ष में जा मिला । उसने अंग्रेजों की सहायता करना स्वीकार कर लिया ।

हैदरअली की विजय

निजाम और अंग्रेजों के मध्य हुई सन्धि से हैदरअली निरुत्साहित नहीं हुआ और अपनी पूरी शक्ति के साथ अंग्रेजों से युद्ध करने लगा । उसने कावेरीपट्टम के दुर्ग पर अधिकार कर लिया । इसके पश्चात् उसने बम्बई की सेना को पराजित करके मंगलौर पर अधिकार कर लिया तथा वह कर्नाटक को रौंदता हुआ मार्च , 1769 में मद्रास के बिल्कुल निकट पहुँच गया । हैदरअली की इस सफलता से अंग्रेज अत्यन्त भयभीत हो गये और घबराकर उन्होंने हैदरअली के साथ 4 अप्रैल , 1769 को एक सन्धि कर ली । जिसकी मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं -

( 1 ) दोनों पक्षों ने एक - दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए ।

( 2 ) अंग्रेजों ने हैदरअली को आश्वासन दिया कि भविष्य में जब कभी भी मैसूर पर कोई आक्रमण होगा तो उसकी सहायता करेंगे । हैदरअली ने भी इसी प्रकार अंग्रेजों की सहायता करने का वचन दिया ।

( 3 ) युद्ध के हर्जाने के रूप में अंग्रेजों ने हैदरअली को एक बड़ी धनराशि देना स्वीकार कर लिया ।

द्वितीय मैसूर युद्ध ( 1780-84 )

1780 ई. में अंग्रेजों और हैदरअली के बीच युद्ध पुनः शुरु हो गया । इस युद्ध के मुख्य कारण निम्नलिखित थे -

( 1 ) 1769 ई . की सन्धि का उल्लंघन

1771 ई . में जब मराठों ने हैदरअली पर आक्रमण किया तो अंग्रेजों ने हैदरअली को किसी प्रकार की सहायता नहीं दी । इस पर हैदरअली बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने अंग्रेजों से इस विश्वासघात का बदला लेने का निश्चय कर लिया ।

( 2 ) उद्देश्यों की विभिन्नता

हैदरअली दक्षिण में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था तथा अंग्रेज भी दक्षिण में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहते थे । वे दक्षिण में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ थे । वे दक्षिण में हैदरअली की बढ़ती हुई शक्ति को सहन नहीं कर सकते थे और हरसम्भव उपाय द्वारा उनकी शक्ति का दमन कर देना चाहते थे ।

( 3 ) माही पर अंग्रेजों का अधिकार

अंग्रेजों ने मार्च , 1779 में भारत में फ्रांसीसी बस्ती माही पर अधिकार कर लिया । इससे हैदरअली बड़ा क्रुद्ध हुआ क्योंकि माही की बस्ती मैसूर राज्य में थी और यह बस्ती हैदरअली के लिए बड़ी लाभप्रद थी । अत : हैदरअली ने अंग्रेजों को माही की बस्ती खाली करने के लिए कहा परन्तु उन्होंने हैदरअली का आदेश मानने से इन्कार कर दिया । परिणामस्वरूप हैदरअली ने अंग्रेजों को पाठ सिखाने का निश्चय कर लिया ।

( 4 ) गुन्टूर पर अंग्रेजों का अधिकार

1779 ई . में अंग्रेजों ने गुन्टूर पर अधिकार कर लिया । इससे हैदरअली तथा हैदराबाद का निजाम दोनों ही अंग्रेजों से नाराज हो गये । अंग्रेजों ने गुन्टूर पर अधिकार करके हैदरअली के समुद्र - तट पर पहुंचने के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया जिससे हैदरअली का अंग्रेजों से नाराज होना स्वाभाविक था ।

घटनाएँ

जुलाई , 1780 में हैदरअली ने 83 हजार सैनिकों की एक विशाल सेना लेकर कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया और अंग्रेजों को परास्त करके अनेक दुर्गों पर अधिकार कर लिया । उसने 10 सितम्बर , 1780 ई . को अंग्रेज सेनापति कर्नल बेली को बुरी तरह से पराजित कर दिया और कर्नल बेली को बन्दी बना लिया गया । इसके पश्चात् हैदरअली ने आगे बढ़कर अक्टूबर , 1780 में कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अधिकार कर लिया । इस प्रकार सम्पूर्ण कर्नाटक पर हैदरअली का अधिकार हो गया ।

वारेन हेस्टिंग्ज की जवाबी कार्यवाही

इस समय अंग्रेजों की स्थिति बड़ी दयनीय थी परन्तु वारेन हेस्टिंग्ज ने शीघ्र ही स्थिति को सम्भाल लिया । उसने सर आयरकूट को एक विशाल सेना देकर मद्रास भेजा । यद्यपि हैदरअली ने अंग्रेजी सेनाओं का वीरतापूर्वक मुकाबला किया परन्तु उसे पर्दोनोवों , पोलितूर और शोलिनगढ़ आदि स्थानों पर पराजय का सामना करना पड़ा ।

हैदरअली की मृत्यु और टीपू सुल्तान द्वारा युद्ध जारी रखना

दुर्भाग्य से युद्ध के दौरान ही 7 सितम्बर , 1782 को हैदरअली की मृत्यु हो गई । हैदरअली की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा । उसने अंग्रेज सेनापति मैथ्यूज को पराजित करके उसे बन्दी बना लिया । अन्त में 1784 में दोनों पक्षों में एक सन्धि हो गई जिसे मंगलौर की सन्धि कहते हैं ।

मंगलौर की सन्धि

मंगलौर की सन्धि के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेश और कैदी वापस कर दिये । अंग्रेजों ने यह भी आश्वासन दिया कि बाह्य आक्रमण के समय वे मैसूर राज्य की सहायता करेंगे ।

हैदरअली का चरित्र और मूल्यांकन

( 1 ) वीर योद्धा और कुशल सेनापति

हैदरअली एक वीर योद्धा और कुशल सेनापति था । उसने अनेक युद्धों में अंग्रेजों को पराजित करके अपने युद्ध कौशल का परिचय दिया । उसने द्वितीय मैसूर - युद्ध के अवसर पर अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया और अंग्रेज सेनापतियों , कर्नल बेली तथा मुनरों की सेनाओं को बुरी तरह से परास्त किया । वह पराजयों तथा असफलताओं से विचलित नहीं होता था बल्कि धैर्य और साहस के साथ विषम परिस्थितियों का सामना करता था । वह एक जन्मजात सैनिक था । बावरिंग का कथन है कि “ हैदर एक जन्मजात सैनिक , एक अच्छा घुड़सवार तथा तलवार चलाने और बन्दूक चलाने दोनों में निपुण था । ”

( 2 ) योग्य शासक

हैदरअली एक योग्य शासक था । उसके समय में मैसूर - राज्य धन सम्पन्न तथा समृद्धशाली राज्य के रूप में प्रसिद्ध था । वह अपनी प्रजा को अपनी सन्तान के तुल्य समझता था तथा उसकी भलाई के लिए सदैव तत्पर रहता था । उसने सार्वजनिक हित के अनेक कार्य किये ।

( 3 ) चतुर राजनीतिज्ञ

हैदरअली एक चतुर राजनीतिज्ञ भी था । वह कूटनीति का जवाब कूटनीति से देना जानता था । जब अंग्रेजों ने 1766 ई . में निजाम तथा मराठों से मिलकर हैदरअली के विरुद्ध एक त्रिगुट का निर्माण किया तो उसने अपने कूटनीतिक चातुर्य से इस त्रिगुट को भंग कर दिया । इसी प्रकार 1780 ई . में उसने निजाम तथा मराठों को अपने साथ मिलाकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया था ।

( 4 ) धर्म - सहिष्णु

हैदरअली में उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी । वह अपनी हिन्दू तथा मुसलमान प्रजा को समान दृष्टि से देखता था । वह सरकारी पद योग्यता के आधार पर दिया करता था । उसके अधिकांश मन्त्री हिन्दू थे । हैदर की उदारता तथा सहिष्णुता के कारण हिन्दू प्रजा उसे आदर तथा श्रद्धा की दृष्टि से देखती थी । श्री नेत्र पाण्डेय का कथन है कि “ हैदर बड़ा ही व्यापक दृष्टिकोण का व्यक्ति था और उसमें उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी । हैदर के राज्य में सभी को पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता थी । ”

( 5 ) व्यक्ति के रूप में

हैदर का व्यक्तित्व बड़ा ऊंचा था । उसका शरीर बड़ा ही सुन्दर तथा सुडौल था । यद्यपि हैदर निरक्षर था परन्तु उसकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी और अनेक समस्याओं पर विचार करने की वह अद्भुत क्षमता रखता था । उसे कई भाषाओं का ज्ञान था । वह कर्तव्यपरायण तथा कठोर परिश्रमी व्यक्ति था । बाउनिंग का कथन है कि “ हैदरअली एक वीर , मौलिक तथा साहसिक सेनापति , कुशल राजनीतिज्ञ एवं साधन - सम्पन्न व्यक्ति था । पराजय से वह कभी हतोत्साहित व निराश नहीं हुआ । वह दृढ़ - प्रतिज्ञ तथा जनहित के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता था । यद्यपि उसके कार्यों द्वारा लोगों में आतंक था , किन्तु उसका नाम मैसूर राज्य में आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता था । उसकी वीरता तथा सफलता हमारे हृदय पर अंकित रहेगी । ”

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