आनुवांशिकी ( Genetics )

Genetics  in Hindi

( 1 ) आनुवांशिकी ( Genetics ) - जीवविज्ञान की वह शाखा जिसमें सजीवों के लक्षणों की वंशागति एवं विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है । उसे आनुवांशिकी कहते हैं । जेनेटिक्स ( Genetics ) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम बेटसन ने सन् 1906 में किया ।

( 2 ) आनुवांशिक लक्षण - सजीवों में लैंगिक जनन की क्रिया के समय युग्मकों द्वारा विभिन्न लक्षणों का पीढ़ी दर पीढ़ी संचरण होता रहता है , इन लक्षणों को आनुवांशिक लक्षण कहते हैं । ये लक्षण लैंगिक जनन के दौरान बनने वाले युग्मकों द्वारा संचरित होते हैं |

( 3 ) वंशागति ( Heredity ) - इन आनुवांशिक लक्षणों का जनक पीढ़ी से संतति पीढ़ी में संचरण ही वंशागति कहलाता है । हेरिडिटी ( Heredity ) शब्द का प्रतिपादन स्पेन्सर ( Spencer ) ने 1863 में किया ।

( 4 ) विभिन्नताएँ ( Variations ) - लैंगिक जनन के दौरान जीन विनिमय ( Crossing over ) होने के कारण एक ही जाति के सजीवों के मध्य परस्पर विभिन्नताएँ पाई जाती हैं ।

( 5 ) ग्रेगर जॉन मेण्डल ( Greger Johann Mendal ) को आनुवांशिकी का जनक ( Father of Genetics ) कहते हैं क्योंकि इन्होंने सर्वप्रथम पादपों में वंशागति के नियमों का प्रतिपादन किया । ग्रेगर जॉन मेंडल का जन्म 22 . 07 . 1822 को सिलिसियन ग्राम ( ऑस्ट्रिया के हेन्जनडार्फ प्रान्त में ) हुआ था ।

( 6 ) मेण्डलवाद ( Mendalism ) - मेण्डल द्वारा उद्यान मटर ( Pistan Sutivtant ) पर किये गये प्रयोगों के परिणाम के आधार पर आनुवांशिकता के नियमों का प्रतिपादन किया गया , जिन्हें मेण्डलवाद भी कहते हैं ।

मेण्डल की सफलता के कारण - एक समय में एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन , मटर के पादप का चयन करना , प्रयोगों के आंकड़ों का सांख्यिकी विश्लेषण ।

मेण्डल ने अपने प्रयोगों के लिए उद्यान मटर का चयन किया , क्योंकि उद्यान मटर का पादप एकवर्षीय , द्विलिंगी , स्वपरागित व कई विपर्यासी लक्षणो युक्त होती है ।

( 7 ) मेण्डलवाद की पुनः खोज ( Rediscovery of Mendalism ) 1900 में यूगो डी ब्रीज ( इंग्लैण्ड ) , कार्ल कोरेन्स ( जर्मनी ) एवं एरिक वॉन शेरमेक ( ऑस्ट्रिया ) ने पृथक - पृथक् रूप से कार्य करते हुए मेण्डल के नियमों की पुनः खोज की ।

( 8 ) आनुवांशिक शब्दावली

जीन ( Gene ) - वह कारक जो किसी एक लक्षण को नियंत्रित करता है , उसे जीन कहते हैं । मेण्डल के कारक ( Factors ) शब्द को जॉहनसन ने जीन नाम दिया ।
युग्मविकल्पी ( Allelomorph or allele ) - किसी एक लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दो विपर्यासी स्वरूपों को युग्मविकल्पी कहते है । जैसे - पौधे की लम्बाई को नियंत्रित करने वाले जीन के दो युग्म विकल्पी T व t है ।
समयुग्मजी ( HomZygous ) - जब किसी लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दोनों युग्मविकल्पी एकसमान हो , उसे समयुग्मजी कहते हैं , जैसे — TT या tt ।
विषमयुग्मजी ( Heterozygotus ) - जब किसी लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दोनों युग्मुविकल्पी असमान हो उसे विषमयुग्मजी कहते हैं , जैसे - Tt ।
लक्षणप्ररूप ( Phenotype ) - किसी सजीव की बाह्य प्रतीति ( External appearance ) को लक्षणप्ररूप कहते हैं । जैसे - लम्बे पौधे सुमयुग्मजी ( TT ) या विषमयुग्मजी ( Tt ) हो सकते हैं ।
जीनप्ररूप ( Genotype ) - किसी सजीव की आनुवंशिकीय रचना को जीनप्ररूप कहते हैं । जैसे शुद्ध या समयुग्मजी लम्बा ( TT ) व अशुद्ध या विषमयुग्मजी लम्बा ( Tt )
प्रभावी लक्षण ( Dominant Characters ) — वह लक्षण जो F1 पीढी में अपने आपको अभिव्यक्त करता है , प्रभावी लक्षण कहलाता है ।
अप्रभावी लक्षण ( Recessive Characters ) — वह लक्षण जो F1 , पीढ़ी में स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है , अप्रभावी लक्षण कहलाता है |
एक संकर क्रॉस ( Monohybrid Cross ) — वह क्रॉस जिसमें एक लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया जाता है , उसे एकसंकर क्रॉस कहते हैं ।
द्विसंकर क्रॉस ( Dihybrid Cross ) — वह क्रॉस जिसमें दो लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है , उसे द्विसंकर क्रॉस कहते हैं ।
त्रिसंकर क्रॉस ( Trihybrid Cross ) - इसमें तीन लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है ।
बहुसंकर क्रॉस ( Polyhybrid Cross ) - इसमें अनेक लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है ।
परीक्षण संकरण ( Test Cross ) — वह क्रॉस जिसमें F1 पीढी का संकरण अप्रभावी लक्षण प्ररूप वाले जनक के साथ किया जाता है , परीक्षण संकरण कहलाता है ।
संकरपूर्वज संकरण ( Back Cross) - वह क्रॉस जिसमें F1 , पीढ़ी का संकरण दोनों जनकों में से किसी एक के साथ किया जाता है , संकरपूर्वज संकरण कहलाता है । |
व्युत्क्रम क्रॉस ( Reciprocal Cross ) - वह क्रॉस जिसमें ' A ' पादप ( TT ) को नर व ' B ' पादप ( tt ) को मादा जनक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है तथा दूसरे क्रॉस में ' A ' पादप ( TT ) को मादा व ' B ' ( tt ) पादप को नर जनक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है , उसे व्यत्क्रम क्रॉस कहते हैं ।
जनक पीढ़ी ( Parental Generation ) - संतति प्राप्त करने के लिए जिन पौधों को संकरण करवाया जाता है , उन्हें जनक पीढ़ी कहते हैं ।
F1 , पीढ़ी व F2 , पीढ़ी - जनकों के संकरण से प्राप्त प्रथम पीढ़ी को F1 पीढ़ी कहते हैं एवं F1 , पीढ़ी के संकरण से प्राप्त संतति को F2 , पीढ़ी कहते हैं ।
एकसंकर अनुपात ( Monohybrid ratio ) - एकसंकर संकरण से प्राप्त अनुपात को एकसंकर अनुपात कहते हैं ।
द्विसंकर अनुपात ( Dihybrid ratio ) - द्विसंकर संकरण से प्राप्त अनुपात को द्विसंकर अनुपात कहते हैं ।

(9) मेण्डल के वंशागति या आनुवंशिकता के नियम

1 . प्रभाविता का नियम - जब एक जोड़ी विपर्यासी समयुग्मजी पादपों में संकरण कराया जाता है , जो लक्षण F1 , पीढ़ी के अभिव्यक्त होते हैं , उसे प्रभावी तथा जो लक्षण F1 , पीढ़ी में अभिव्यक्त नहीं होते अप्रभावी कहते हैं । इसे ही प्रभाविता का नियम कहते हैं ।
2 . पृथक्करण का नियम - F1 , पीढ़ी के विषमयुग्मजी ( संकर ) से युग्मक बनते समय दोनों युग्मविकल्पी एक दूसरे से पृथक हो जाते हैं । तथा अलग - अलग युग्मकों में जाते हैं , इसे ही युग्मकों की शुद्धता का नियम या पृथक्करण का नियम कहते हैं ।
3 . स्वतंत्र अपव्यूह्न का नियम - दो या दो से अधिक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों युक्त पादपों के बीच संकरण कराया जाता है , तो प्रत्येक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों की वंशागति एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होती । है । इसे ही स्वतंत्र अपव्यूह्न का नियम कहते हैं ।

(10) मेण्डल के वंशागति के नियमों का महत्व

1 . अप्रभावी लक्षण विषमयुग्मजी अवस्था में प्रकट नहीं होते हैं ।
2 . संकरण विधि द्वारा उपयोगी लक्षणों का विकास किया जा सकता है ।
3 . सुजननिकी ( Eugenics ) मेण्डलीय नियमों पर आधारित है ।
4 . जीन संकल्पना की पुष्टि पृथक्करण के नियम से होती है ।
5.मेण्डल के नियमों के उपयोग से रोग प्रतिरोधक तथा अधिक उत्पादन वाले फसली पौधों की किस्में विकसित की जाती हैं ।
6.संकरण विधि से अनुपयोगी लक्षणों को हटाया जा सकता है तथा उपयोगी लक्षणों को एक साथ एक ही जाति में लाया जा सकता है ।

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