जैव विविधता एवं इसका संरक्षण (Biodiversity and Its Conservation)

Biodiversity and Its Conservation

परिभाषा - ' जीव जन्तुओं में पाए जाने वाली विभिन्नता , विषमता तथा पारिस्थितिकीय जटिलता ही जैव विविधता कहलाती है । ' - संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रकाशित ' प्रौद्योगिकी आकलन रिपोर्ट , 1987 ' के अनुसार ।

पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन स्थापित रखने के लिए जैव विविधता का बने रहना अत्यावश्यक है ।

प्रजाति - जीवों का ऐसा समूह जिसके सदस्य दिखने में एक जैसे हो तथा प्राकृतिक परिवेश में प्रजनन कर संतान पैदा करने की क्षमता रखते हो एक प्रजाति कहलाता है ।

जैव विविधता के मुख्य रूप से तीन स्तर है -

1 . प्रजाति विविधता - किसी क्षेत्र विशेष में पाये जाने वाले जीवों की विभिन्न प्रजातियों की कुल संख्या उस क्षेत्र की प्रजाति विविधता कहलाती है ।

2 . आनुवांशिक विविधता - एक प्रजाति के विभिन्न सदस्यों के बीच जीन ( आनुवांशिक इकाई ) के कारण पाई जाने वाली भिन्नता को आनुवांशिक विविधता कहते हैं ।

3 . पारिस्थितिक तंत्र विविधता - किसी स्थान विशेष के सभी जीवों की परस्पर एवं उनके वातावरण के विभिन्न अजैविक घटकों में अंत : क्रियाओं से बनने वाले तंत्र को पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं ।

विभिन्न भौगोलिक व पर्यावरणीय विशेषताओं वाले पारिस्थितिक तंत्र में पाये जाने वाले जीवों में भी विविधता पायी जाती है । पारिस्थितिक तंत्रों की इसी भिन्नता को पारिस्थितिक तंत्र की विविधता कहते हैं ।

मिलेनियम इकोसिस्टम असेसमेंट के अनुसार पृथ्वी पर 50 - 300 लाख प्रजातियाँ पाई जाती है , जिनमें से 17 - 20 लाख प्रजातियों की पहचान हो चुकी है । भूमध्य रेखा से दूर ( ध्रुवों की ओर ) जाने पर जैव विविधता में कमी आती जाती है ।

भूमध्य रेखा पर ऊष्णकटिबंधीय वन क्षेत्र में जैव विविधता प्रचुरता से पायी जाती है ।

विश्व के 17 वृहद जैव विविधता वाले देशों में भारत भी शामिल है ।

भारत में विश्व की कुल भूमि का 2.4 प्रतिशत भाग तथा जैव विविधता 7 - 8 प्रतिशत पायी जाती है ।

कृषि विविधता की दृष्टि से भारत का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है । भारत में लगभग 167 खाद्य फसल वाली प्रजातियाँ उगाई जाती है ।

ऐसे क्षेत्र जहाँ जैव विविधता प्रचुर होती है , उन्हें ‘ जैव विविधता तप्त स्थल ’ कहते हैं ।

विश्व में कुल जैव विविधता तप्त स्थलों की संख्या 34 है ।

भारत के जैव विविधता तप्त स्थलों में दो पूर्णरूप से भारत में तथा तीसरे ( इण्डो बर्मा जैव विविधता तप्त स्थल ) का कुछ भू भाग ही भारत में स्थित है ।

भारत के पूर्वी हिमालय जैव विविधता तप्त स्थल के अंतर्गत पूर्वी हिमालय का असम , अरूणाचल प्रदेश , सिक्किम व पश्चिम बंगाल राज्यों के क्षेत्र आते हैं ।

भारत के पश्चिमी घाट जैव विविधता तप्त स्थल भारत के पश्चिमी तट से संबंधित है ।

इण्डो - बर्मा जैव विविधता तप्त स्थल में पूर्वी एशिया के भारत के अतिरिक्त चीन , म्यांमार , वियतनाम , कम्बोडिया , थाइलैण्ड व मलेशिया देशों के भी भू भाग आते हैं ।

वे प्रजातियाँ जो किसी क्षेत्र विशेष में ही पायी जाती है , उन्हें स्थानबद्ध ( Endemic ) प्रजातियाँ कहते हैं । उदा . लेमूर ( मेडागास्कर द्वीप में ) , मेकाका बंदर व नीलगिरी थार ( भारत के पश्चिमी घाट ) ।

मॉरीशस के एक द्वीप में स्थानबद्ध प्रजाति ' डोडो ' को सन् 1658 में सबसे पहले देखा गया जो सन् 1681 के बाद नहीं दिखाई दिया अर्थात् विलुप्त हो गया ।

वर्ष 2009 में गांगेय डाल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया ।

जैव विविधता के महत्व -

1 . आर्थिक महत्व
2 . औषधीय महत्व
3 . पर्यावरणीय महत्व
4 . सामाजिक , सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व

जैव विविधता से हमारी खाद्य , ईधन , चारे , इमारती लकड़ी व औद्योगिक कच्चे माल की आवश्यकता पूरी होती है ।

जैव विविधता से जंगली प्रजातियों के विभिन्न मानव उपयोगी गुण ( जैसे कीट रोधी , रोग रोधी गुण ) नई किस्मों व नस्लों के विकास में काम आते हैं ।

जेट्रोपा व करंज जैसे पादपों के बीजों से जैव ईंधन बनाया जाता है , अतः इन पादपों को बायोडीजल वृक्ष भी कहा जाता है ।

जैवविविधता के कारण हमें विभिन्न रोगों के उपचार हेतु औषधियाँ प्राप्त होती है । मलेरिया रोग के उपचार हेतु काम आने वाली औषधी सिनकोना वृक्ष की छाल से बनायी जाती है ।

जैव विविधता समृद्ध होने पर खाद्य श्रृंखला में किसी एक जाति के कम होने पर खाद्य जाल की दूसरी प्रजाति द्वारा उसकी कमी को पूरा कर खाद्य श्रृंखला संरक्षण करती है ।

जैव विविधता से पोषण चक्र गतिमान रहने में मदद मिलती है ।

जैव विविधता से पर्यावरण प्रदूषण पर भी नियंत्रण होता है ।

हमारी संस्कृति में विभिन्न पादपों व जन्तुओं को विशेष महत्व दिया गया है तथा इनको संरक्षण भी दिया जाता है ।

आदिवासी समाज का जैव विविधता व प्रकृति के निकट का एवं गहरा संबंध रहा है ।

मानव बुद्धिमान प्राणी हैं अत : उसका दायित्व है कि वह पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जैव विविधता का संरक्षण करे ।

प्रकृति में विभिन्न जीव जातियाँ विलुप्त होती रहती है तथा नई जातियों का विकास होता रहता है ।

मनुष्य के अविवेकपूर्ण कार्यों से जैवविविधता पर संकट आ गया है ।

जैव विविधता संकट के कारण -

  1. 1 . प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना
  2. 2 . प्राकृतिक आवासों का विखण्डन
  3. 3 . जलवायु परिवर्तन
  4. 4 . पर्यावरण प्रदूषण
  5. 5 . प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित विदोहन
  6. 6 . कृषि एवं वानिकी में व्यावसायिक प्रवृति
  7. 7 . विदेशी प्रजातियों का आक्रमण
  8. 8 . अंधविश्वास एवं अज्ञानता

बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु विभिन्न प्राकृतिक आवासों को नष्ट किया गया है ।

प्राकृतिक आवासों के विखण्डन के प्रमुख कारण में - सड़क मार्ग , रेलमार्ग , नहर , गैस पाइप लाइन , विद्युत लाइन , बांध व खेत आदि प्रमुख है ।

जलवायु परिवर्तन से भी जैवविविधता के लिए संकट उत्पन्न हो गया है । पृथ्वी के तापमान में 3 . 5°C वृद्धि होने पर विश्व की 70 प्रतिशत प्रजातियाँ विलुप्ती के खतरे में पड़ जायेंगी ।

पर्यावरण प्रदूषण से विभिन्न प्रजातियाँ विशेषतः सूक्ष्म जीव व लाइकेन तीव्रता से विलुप्त हो रहे हैं ।

प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित विदोहन से कई प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है ।

कृषि क्षेत्र के विस्तार तथा पेपर , माचिस , प्लाइवुड आदि उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति के कारण प्राकृतिक वनों का विनाश हुआ है ।

कई विदेशी पादप व जन्तु जातियों के आक्रमण से स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो गया ।

अंधविश्वास व अज्ञानता के कारण गागरोनी तोते , गोडावन व गोयरा की प्रजातियाँ संकट में पड़ गई है ।

विश्व प्राकृतिक संरक्षण संघ ( IUCN - International Union for Conservation of Nature ) का गठन 1968 में हुआ ।

IUCN ने 1972 में ‘ रेड डाटा बुक ’ का प्रकाशन किया ।

IUCN ने विश्व की जीव जातियों को संरक्षण की दृष्टि से 5 संवर्गों में बांटा -

  • ( i ) विलुप्त प्रजातियाँ
  • ( ii ) संकट ग्रस्त प्रजातियाँ
  • ( iii ) अतिसंवेदनशील प्रजातिया
  • ( iv ) दुर्लभ प्रजातियाँ
  • ( v ) अपर्याप्त रूप से ज्ञात प्रजातिया ।
  • IUCN ने संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर नियंत्रण लगाने पर सहमति देने हेतु सन् 1973 में एक कनवेंशन ( CITES - Convention on International Trade in Endangered Species ) का आयोजन किया ।

    सन् 1992 में ब्राजील में हुए पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता संधि ( Convention on Biodiversity ) अस्तित्व में आयी ।

    सन् 2002 में भारत में जैव विविधता एक्ट 2002 बनाया गया ।

    जैव विविधता एक्ट 2002 के अनुसार त्रिस्तरीय संगठन ( 1 . राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण , 2 . जैव विविधता बोर्ड एवं 3 . जैव विविधता प्रबंध समितियाँ ) का प्रावधान है ।

    संयुक्त राष्ट्र द्वारा 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस घोषित किया गया है ।

    2 जून 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन हुआ ।

    जैव विविधता का संरक्षण मुख्य रूप से दो प्रकार से किया जा सकता है -

    1.स्व : स्थाने संरक्षण 2.बहिस्थाने संरक्षण

    यदि जीवों का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवास में ही मानव द्वारा प्रदत्त अनुरक्षण से किया जाता है , तो इसे स्वस्थाने संरक्षण कहते हैं । उदा . जैव मण्डल रिजर्व ( भारत में 14 ) , राष्ट्रीय उद्यान ( भारत में 99 ) एवं वन्य जीव अभ्यारण्य ( भारत में 523 ) आदि ।

    बहि : स्थाने संरक्षण में संकट ग्रस्त जीव जातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर कृत्रिम आवास में संरक्षण प्रदान किया जाता है । उदा . वानस्पतिक उद्यान , बीज बैंक , जीन बैंक एवं उत्तक संवर्धन आदि ।

    वनस्पतिजात और प्राणिजात और उनके आवास के संरक्षण हेतु संरक्षित क्षेत्र चिह्नित किए गए जिन्हें अभ्यारण्य , राष्ट्रीय उद्यान और जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र कहते हैं । वृक्षारोपण , कृषि , चारागाह , वृक्षों की कटाई , शिकार , खाल प्राप्त करने हेतु शिकार ( पोचिंग ) इन क्षेत्रों में निषिद्ध हैं :

    अभ्यारण्य - वह क्षेत्र जहाँ जंतु एवं उनके आवास किसी भी प्रकार के विक्षोभ से सुरक्षित रहते हैं ।

    राष्ट्रीय उद्यान - वन्य जंतुओं के लिए आरक्षित क्षेत्र जहाँ वह स्वतंत्र ( निबंध ) रूप से आवास एवं प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं ।

    जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र - वन्य जीवन , पौधों और जंतु संसाधनों और उस क्षेत्र के आदिवासियों के पारंपरिक ढंग से जीवनयापन हेत विशाल संरक्षित क्षेत्र ।


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