इतिहास से संबंधित शब्दावली

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प्राचीन भारत

प्राक् - इतिहास - संस्कृति के आरम्भ बिन्दु ( लगभग 30 लाख वर्ष पहले ) से लेकर 3000 ई . पू . तक का इतिहास ।

आद्य - इतिहास - भारत के सन्दर्भ में खाद्य उत्पादन के आरम्भ ( 5000 ई . पू . ) से लेकर 600 ई . पू . तक का समय ।

वैदिक साहित्य -वह साहित्य जिसमें ऋक , साम , यजुर तथा अथर्ववेद की संहिता , ब्राह्मण ग्रन्थ , आरण्यक व उपनिषद् सम्मिलित किए जाते हैं ।

झूकर संस्कृति- हड़प्पा संस्कृति के बाद के युग की वह संस्कृति जो सिन्ध के झूकर प्रदेश में सबसे पहले ज्ञात हुई ।

कब्रिस्तान एच . संस्कृति- पश्चिम पंजाब तथा बहावलपुर में , हड़प्पा स्थल के कब्रिस्तान से प्राप्त एक विशिष्ट मृद भांड प्रारूप पर आधारित संस्कृति ।

अहाड़ संस्कृति- आधुनिक उदयपुर के समीप स्थित अहाड़ नामक स्थान पर खुदाई में प्राप्त ताम्रपाषाण संस्कृति ( यह स्थल बनास नदी की घाटी में होने के कारण इसे बनास संस्कृति भी कहते हैं । )

कामथ संस्कृति -मालवा में 2200 2000 ई . पू . के मध्य पाई जाने वाली ताम्र पाषाण संस्कृति ।

धर्म - चक्र - प्रवर्तन -गौतम बुद्ध द्वारा सारनाथ में पाँच ब्राह्मणों को दिया गया पहला धार्मिक उपदेश जिससे धर्म प्रचार आरम्भ हुआ ।

प्रतीत्य समुत्पाद -बौद्ध दर्शन का वह सिद्धान्त जो विकास की व्याख्या कारण कार्य सम्बन्ध से करता है । ( प्रतीत्य = इसके होने से समुत्पाद = यह उत्पन्न होता है । )

स्यादवाद -जैन धर्म का वह सिद्धान्त जिसके अनुसार हर ज्ञान को सात विभिन्न स्वरूपों में व्यक्त किया जा सकता है । इसे सप्तभंगी ज्ञान या अनेकांतवाद भी कहा जाता है ।

अणुव्रत -सत्य , अहिंसा , अस्तेय , अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य के जैन सिद्धान्त का वह उदार रूप जिसे गृहस्थ लोग अपनाते थे । महाव्रत में इन्हीं सिद्धान्तों का कठोरता से पालन किया जाता है ।

वेत्यी प्रथा -पशुओं की चोरी या लूट करने की संगमकाल में प्रचलित प्रथा जिसका पालन मरवा जनजातियों द्वारा किया जाता था ।

पेठ -गुप्तकाल में गाँवों की छोटी इकाइयाँ , इनका उल्लेख संक्षोभ के खोह अभिलेख में मिलता है ।

उपरिक - गुप्तकाल में शासन की प्रादेशिक इकाई ' भुक्ति का मुख्य अधिकारी ।

गोप्ता -गुप्तकाल में शासन की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई ' देश ' का मुख्य अधिकारी ।

उद्रंग -व्यूहलर के अनुसार गुप्तकाल में राज्य को दिया जाने वाला भूमिकर पी . एल . गुप्ता के अनुसार ' भोग ' नामक कर का पर्यायवाची ।

क्षेत्र -गुप्तकाल के संदर्भ में वह जमीन जो खेती के योग्य हो । वास्तु रहने योग्य जमीन को गुप्तकाल में वास्तु कहा गया ।

सिल - न जोती जाने वाली जमीन गुप्तकाल में सिल कहलाती थी । ऐसी जंगली भूमि को ' अप्रहत ' भी कहा जाता था ।

सवूकफूरिया - गुप्तोत्तरकाल के क्षत्रियों के एक वर्ग के लिए इब्न खुादव द्वारा प्रयुक्त शब्द , राजवंश , सामंत वर्ग तथा योद्धा वर्ग के क्षत्रिय इसमें आते थे ।

कतरिया -इब्न खुर्दादव द्वारा किए गए क्षत्रियों के वर्गीकरण में गुप्तोत्तरकाल के क्षत्रियों का वह भाग जो कृषि व्यापार आदि गैर - क्षत्रिय व्यवसायों से जीविका चलाते थे ।

व्यधसीरिन या सीरिन- गुप्तोत्तरकाल के किसानों का वह वर्ग जो बटाई पर खेती करने का काम करता था ।

महाजनपद - उत्तर - वैदिककाल के बाद के समय के प्रमुख राज्य अगुन्तर निकाय ग्रन्थ के अनुसार इन राज्यों की संख्या सोलह थी ।

सम्राट् -सोलह महाजनपदों के काल में ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार पूर्वी भारत के राजाओं का विरुद ।

भोज -ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार दक्षिण दिशा के राज्यों के शासक जो सम्भवतः एक निश्चित काल के लिए होते थे ।

राजा - मध्य देश के राज्यों के शासक ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार राजा कहलाते थे ।

विराट -उत्तर दिशा में हिमालय क्षेत्र के राज्यों के शासक इस नाम से पुकारे जाते थे ।

स्वराट -पश्चिम दिशा के राज्यों के शासकों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द । ऐसे शासक की स्थिति समानों में ज्येष्ठ की थी ।

धम्म महामात्र- अशोक के समय नियुक्त किया गया अधिकारियों का वर्ग , जो अशोक के धम्म के सिद्धान्त का जनता में प्रचार करता ।

ब्रह्मदेय भूमि- मौर्यकाल में शिक्षकों , पुरोहितों व वेदपाठी ब्राह्मणों को दान में दी गई कर मुक्त भूमि ।

वार्ता -धर्मशास्त्रों व कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में शूद्रों के लिए निर्धारित जीविकोपार्जन के साधन कृषि , पशुपालन तथा वाणिज्य ।

अनिष्कासिनी- कौटिल्य के अनुसार मौर्यकाल में संभ्रान्त परिवार की नारियाँ जिन्हें घर से बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं थी ।

सेतुबंध -मौर्यकाल में राज्य द्वारा सिंचाई के लिए तालाब , कुएं तथा झीलों पर बाँध बनाकर पानी को एक स्थान पर एकत्र करने की व्यवस्था ।

एग्रोनोमोई -मेगस्थनीज के अनुसार मौर्यकाल में मार्ग निर्माण करने वाला अधिकारी ।

तीर्थ ( महामात्र )- मौर्यकाल में अधि कारियों का एक विशाल वर्ग जो साम्राज्य के विभिन्न भागों से शासन का संचालन करते थे ।

संगम साहित्य- तमिल कवियों के संघ या मण्डल द्वारा 120 - 150 वर्षों में चार - पाँच पीढियों में रचित साहित्य जिसका रचनाकाल 100 - 250 ई . तक है ।

मध्यकालीन भारत

शरईया -वह दैवी कानून जिनका उल्लेख कुरान में स्पष्ट रूप से किया गया है ।

सुन्ना -पैगम्बर द्वारा बनाए गए वह सिद्धान्त जो शरीयत का समर्थन करते हैं ।

खलीफा -कुरान के अनुसार पृथ्वी पर खुदा के प्रतिनिधि को खलीफा कहा जाता है । पैगम्बर साहब के उत्तराधिकारियों के लिए भी यही उपाधि अपनाई गई ।

अक्ता -निजाम - उल - मुल्क के ' सिया सतनामा ' के अनुसार इस संस्था का तात्पर्य क्षेत्र विशेष के राजस्व के हस्तांतरण से था । क्षेत्र में कानून व्वस्था का उत्तरदायित्व भी राजस्व प्राप्त करने वाले का होता था ।

काजी - उल - कजात -सल्तनतकाल के आरम्भ से ही सुल्तान के बाद राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश ।अन्य काजियों की नियुक्ति उसी की सिफारिश से होती थी ।

सिजदा और पायबोस - बलबन के दरबार की परम्पराएँ जो व्यक्ति सुल्तान के पास जाता वह घुटने के बल बैठकर सिर झुकाता ( सिजदा ) तथा उसका चरण चुम्बन ( पायबोस ) करता ।

उलेमा - सल्तनतकाल में विद्वानों का वह वर्ग जिसे धर्म के सिद्धान्तों की व्याख्या करने का अधिकार था ।

अमीर - सल्तनतकाल में अधिकारियों के वे वर्ग जो राज्य के सभी प्रमुख पदों पर नियुक्त थे ।

वजीर -भारत में वजीर के पद की स्थापना सल्तनतकाल के आरम्भ से ही हो गई थी । वजीर सुल्तान का मुख्यमंत्री था । वह मूलतः वित्त विभाग को देखता था । उसका कार्यालय दीवान - ए - विजारत कहलाता था ।

मुशरिफ - ए - मुमलिक- दीवान - ए - विजारत का वह अधिकारी जो प्रान्तों तथा अन्य विभागों से प्राप्त हिसाब का लेखा - जोखा रखता था ।

मुस्तौफी - ए - मुमलिक- यह पदाधिकारी मुशरिफ के हिसाब की जाँच करता था ।

दीवान - ए - बकूफ -इस विभाग की स्थापना जलालुद्दीन फिरोज खलजी ने की । इसका कार्य था – व्यय के कागजात की देखभाल करना ।

जजिया -वह कर जो मुस्लिम सरकार गैर - मुस्लिमों की सम्पत्ति व सम्मान की रक्षा करने के दायित्व पूरा करने के बदले उनसे लेती थी । सैनिक सेवा से मुक्ति पाने के बदले भी यह कर दिया जाता था ।

मुतशर्रिफ- वह अधिकारी जो सल्तनत काल में कारखाने का अध्यक्ष होता तथा अपने कारखाने का हिसाब रखता था ।

जकात -वह कर जो मुस्लिमों को अपनी वार्षिक एवं एक न्यूनतम सीमा से अधिक आय पर देना पड़ता था । इसकी दर 2 ½ % थी ।

भसाहत- कर निर्धारण की वह पद्धति जो भूमि की पैमाइश पर आधारित थी । इसे अलाउद्दीन खलजी ने आरम्भ किया ।

खालसा भूमि -सल्तनतकाल में तथा उसके बाद भी वह भूमि जो सीधे केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में थी ।

मुक्ता -सल्तनतकाल में अक्ता के पदाधिकारी को मुक्ता कहा जाता था । कभी - कभी उसे दली भी कहा जाता था ।

चौथ- भू - राजस्व का चतुर्थांश जिसे शिवाजी पड़ोस के मुगल क्षेत्रों से वसूल करते थे ।

मीर बख्शी - मुगलकाल में सैन्य विभाग का अध्यक्ष । वह गुप्तचर एवं सूचना एजेन्सियों का भी अध्यक्ष था ।

शिकदार - शेरशाह के शासनकाल में परगना नामक प्रादेशिक इकाई का मुख्य अधिकारी ।

सरकार - सल्तनतकाल से चली आ | रही प्रादेशिक प्रशासन की इकाई जो परगना से ऊपर थी ।

मुंसिफ - शेरशाह के समय परगना का अधिकारी जो कर वसूली का प्रबन्ध करता था ।

आधुनिक भारत

कर्नाटक युद्ध - कर्नाटक प्रदेश में इंगलैण्ड तथा फ्रांस की व्यापारिक कम्पनी के मध्य होने वाले युद्ध । यह युद्ध तीन थे , जो क्रमशः 1746 - 48 , 1749 - 55 तथा 1756 - 63 में लड़े गए ।

अलीनगर - कलकत्ता का नाम जो उसे जीतने के बाद 1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने रखा ।

दीवानी - किसी सूबा में भूमिकर व अन्य कर वसूल करने का अधिकार । 12 अगस्त , 1765 को बंगाल में यह अधिकार ईस्ट - इण्डिया कम्पनी को प्राप्त हो गया ।

द्वैध शासन - शासन चलाने के लिए दो समानान्तर शक्तियों का कार्य करना । 1765 में बंगाल में दीवानी कम्पनी को तथा निजामत नवाब को प्राप्त होने से यह व्यवस्था स्थापित हुई ।

दस्तक -बंगाल में कम्पनी को प्राप्त अधिकार - पत्र जो उन्हें करमुक्त व्यापार की छूट देता था ।

इजारा प्रथा -कर वसूली की वह पद्धति जिसमें ठेकेदारी या नीलामी द्वारा यह वसूल करने का अधिकार किसी व्यक्ति को प्राप्त होता था ।

दक्ष निष्क्रियता- ( Masterly inactivity ) - गवर्नर जनरल जॉन लारेन्स ( 1863 ई . ) द्वारा अफगानिस्तान के सम्बन्ध में अपनाई गई अहस्तक्षेप की नीति ।

निजी व्यापार - वह व्यापार जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्मचारी कम्पनी के लिए न करके स्वयं अपने लिए करते थे ।

व्यपगत सिद्धान्त -( Doctrine of Lapse ) - वह सिद्धान्त जिसके अनुसार दत्तक पुत्र के राज्याधिकार जो स्वीकृति देना , न देना ब्रिटिश शासन की इच्छा पर था । अस्वीकृति की स्थिति में राज्य अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाता था ।

अधोमुखी निस्यंदन सिद्धान्त - कम्पनी के शासनकाल में शिक्षा नीति का सिद्धान्त जिसमें केवल उच्च वर्ग के लोगों को शिक्षित करने के लिए कहा गया था ।

बुनियादी शिक्षा - गांधी द्वारा प्रतिपादित प्राथमिक शिक्षा की वह नीति जो उत्पादक कार्यों के माध्यम से बालक को शिक्षित करती थी ।

प्रसंविदायुक्त सेवा -( Covenanted Service ) - ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्म चारियों का वह वर्ग जो पद ग्रहण करते समय एक प्रसंविदा पर हस्ताक्षर करते थे । यह नामकरण लॉर्ड क्लाइव के समय में हुआ था ।

शुद्धि आन्दोलन - वह आन्दोलन जिसके द्वारा भूतपूर्व हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापस लाने का प्रयास किया गया . यह आर्य समाज का आन्दोलन था ।

सहायक सेना - वह सेना जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी राज्यों की सहायता के लिए उनके खर्च पर रखती थी ।

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