उत्सर्जन तन्त्र ( Excretory system )

महत्वपूर्ण बिंदु

( 1 ) उत्सर्जन तन्त्र ( Excretory system ) - उपापचयी प्रक्रियाओं के फलस्वरूप निर्मित अपशिष्ट उत्पादों एवं अतिरिक्त लवणों को शरीर से बाहर त्यागना उत्सर्जन कहलाता है । उत्सर्जन से सम्बन्धित अंगों को उत्सर्जन अंग कहते हैं । उत्सर्जन अंगों को सामूहिक रूप से उत्सर्जन तन्त्र कहते हैं ।

( 2 ) मनुष्य में निम्न उत्सर्जन अंग पाये जाते हैं -

  • ( i ) वृक्क ( Kidney )
  • ( ii ) मूत्र वाहिनियाँ ( Ureters )
  • ( iii ) मूत्राशय ( Urinary Bladder )
  • ( iv ) मूत्र मार्ग ( Urethera )

( 3 ) नेफ्रॉन ( Nephron ) - ये वृक्क की क्रियात्मक एवं संरचनात्मक इकाई है । उत्सर्जी उत्पाद विलेय नाइट्रोजनी यौगिकों के रूप में वृक्क में नेफ्रॉन द्वारा निकाले जाते हैं ।

विस्तृत विवरण

उत्सर्जन तंत्र का अर्थ है शरीर से अपशिष्ट पदार्थो को बाहर निकालने की व्यवस्था । अतः उत्सर्जन शरीर की वह व्यवस्था है जिसमें शरीर की कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट को बाहर निकाला जाता है ।

उत्सर्जन तन्त्र ( Excretory system )

कोई भी प्राणी उपापचयी क्रियाओं द्वारा अपशिष्ट पदार्थों जैसे अमोनिया , यूरिया , यूरिक अम्ल , कार्बन डाइऑक्साइड आदि का संचय करता रहता है । इन अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन एक अत्यंत ही आवश्यक क्रिया है अन्यथा ये ( विशेष रूप से नाइट्रोजनी अपशिष्ट ) प्राणी शरीर में आविष के समान कार्य करते है । कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन फेफड़ो के माध्यम से होता है । संचित नाइट्रोजनी अपशिष्ट के उत्सर्जन हेतु एक विशेष तंत्र जिसे उत्सर्जन तंत्र कहा जाता है , कार्य करता है । इस तंत्र में वृक्क ( Kidney ) मुख्य भूमिका निभाते है । नाइट्रोजनी अपशिष्ट तीन प्रकार के होते है -

( अ ) अमोनिया : - अमोनिया उत्सर्जन अमोनियोत्सर्ग प्रक्रिया ( Ammonotelism ) के द्वारा संपन्न किया जाता है ।अनेक अस्थिल मछलियाँ , उभयचर तथा जलीय कीट इस प्रक्रिया द्वारा अमोनिया का उत्सर्जन करते हैं । अमोनिया उत्सर्जन के लिए अत्यधिक जल की आवश्यकता होती है ।

( ब ) यूरिया : - मुख्यतः यूरिया उत्सर्जन स्तनधारी , समुद्री मछलियाँ आदि करते है । इन जीवो को यूरिया उत्सर्जी ( Ureotelic ) कहा जाता है । कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जित अमोनिया को यकृत यूरिया में परिवर्तित करता है जिसे वृक्को द्वारा निस्पंदन कर उत्सर्जित कर दिया जाता है ।

( स ) यूरिक अम्ल : - पक्षियों , सरीसृपों , कीटों आदि में अमोनिया को यूरिक अम्ल में परिवर्तित कर यूरिक अम्ल का निर्माण किया जाता है । यूरिक अम्ल को अत्यंत कम जल के साथ गोलिकाओं अथवा पेस्ट के रूप में उत्सर्जित किया जाता है । ऐसे जीवों को यूरिक अम्ल उत्सर्जी ( Uricotelic ) कहा जाता है ।

मानव उत्सर्जन तंत्र

मनुष्यों का उत्सर्जन तंत्र शरीर के तरल अपशिष्टों को एकत्र कर उनका निष्कासन करता है । इस तंत्र में दो वृक्क ( Kidneys ) , एक मूत्राशय ( Bladder ) , दो मूत्रवाहिनियाँ ( Ureters ) तथा एक मूत्र मार्ग ( Urethera ) होता है ।

( अ ) वृक्क : यह मानव का मुख्य उत्सर्जन अंग है । यह शरीर से करीब 75 - 80 प्रतिशत तरल अपशिष्टों को बाहर निकालता है , साथ ही शरीर में स्त्रावित समस्त रसों का नियंत्रण करता है । यह सेम के दानों की आकृति के गहरे भूरे रंग के होते है । ये उदरगुहा में पीठ की ओर आमाशय के नीचे कशेरूक दण्ड के दाएँ व बाएँ भाग में स्थित है । वृक्क की मध्य सतह पर एक रवांच होती है , जो हाइलम कहलाती हैं । मूत्र नलिका , तंत्रिकाएँ व रक्त वाहिनियाँ हाइल्म से होकर वृक्क में प्रवेश करती हैं । हाइलम के भीतरी भाग में कीप के आकार की वृक्कीय श्रोणि ( Pelvis ) पाई जाती हैं । प्रत्येक वृक्क के दो भाग होते हैं बाहरी वल्कुट ( Cortex ) तथा भीतरी मध्यांश ( Medula ) । प्रत्येक वृक्क कई लाख उत्सर्जन इकाइयों से मिलकर बना होता हैं जिन्हें वृक्काणु ( नेफ्रॉन ) कहा जाता है। प्रत्येक नेफ्रॉन के दो भाग होते हैं -

( a ) बोमेन संपुट ( Bowman ' s capsule ) - यह नेफ्रान के ऊपरी भाग में पाए जाने वाला कप के आकार का थैला होता है । बोमेन संपुट में शाखा अभिवाही धमनियों की कोशिकाओं का एक गुच्छा पाया जाता है । इन गुच्छों को ग्लोमेरूलस ( Glomerulus ) कहा जाता है । ग्लोमेरूलस का एक सिरा जो बोमेन संपुट में अपशिष्ट युक्त गंदा रक्त लाता है , वृक्क धमनी से जुड़ा होता है तथा द्वितीय हिस्सा स्वच्छ रक्त को ले जाने हेतु वृक्क शिरा से जुड़ा होता है ।

( ब ) वृक्क नलिका : यह बोमेन सपुंट के निचले हिस्से से प्रारंभ होने वाली नलिका है , जिसका दूसरा हिस्सा मूत्र एकत्र करने वाली नलिका से जुड़ा होता है । मध्य भाग में यह नलिका हेयर पिननुमा कुडंलित हेनले - लूप का निर्माण करती है ।

nefron

मूत्र निर्माण

मूत्र का निर्माण तीन चरणों में संपादित होता हैं - गुच्छीय निस्पंदन , पुनः अवशोषण तथ स्त्रवण । ये सभी कार्य वृक्क के विभिन्न हिस्सों में होते है । वृक्क में लगातार रक्त प्रवाहित होता रहता है । यह रक्त वृक्क धमनी के द्वारा लाया जाता है । यह रक्त अवशिष्ट पदार्थों से युक्त होता है । इस धमनी की शाखा अभिवाही धमनियाँ ( Afferent arteriole ) नेफ्रॉन में बोमेन संपुट में जाकर केशिकाओं के गुच्छ के तौर पर परिवर्तित होती यहां रक्त का निस्पंदन कार्य पूर्ण किया जाता है । प्रति मिनट करीब 1000 - 1200 ml रक्त का निस्पंदन कार्य पूर्ण किया जाताहै । यहाँ रक्त में से ग्लूकोज , लवण , एमीनो अम्ल , यूरिया आदि तत्त्व निस्पंदित होकर बोमन सपुंट में एकत्र हो जाते है । यह निस्पंदन फिर वृक्क नलिका में से गुजरता है । वृक्क नलिका की दीवारें धनाकार उपकला ( Epithelium ) कोशिकाओं से बनी होती है । ये कोशिकाएँ निस्पंदन में से लगभग पूर्ण ग्लूकोज , अमीनों अम्ल तथा अन्य उपयोगी पदार्थों का पुनःअवशोषित कर लेती है । तत्पश्चात् इन पदार्थों को रक्त प्रवाह में पुनः प्रेषित कर दिया जाता है । करीब 99 प्रतिशत निस्पंदन वृक्क नलिकाओं द्वारा पुनः अवशोषित कर लिया जाता है । नेफ्रॉन द्वारा पुनः अवशोषण पश्चात् साफ रक्त को अपवाही धमनिका ( Efferent arteriole ) संगृहीत करती है । पुनः अवशोषण किए जाने वाले पदार्थों में यूरिया जैसे अपशिष्ट पदार्थ शामिल नहीं होते । ये पदार्थ वृक्क नालिकाओं में ही रहते है । ऐसे अपशिष्ट युक्त तरल पदार्थ ही मूत्र निर्माण करते हैं । नेफ्रॉन से मूत्र वृक्क की संग्रहण नलिका में ले जाया जाता है । जहाँ से मूत्र मूत्रनली में प्रवेश करता है । प्रत्येक वृक्क से एक मूत्रनली मूत्राशय में खुलती है । मूत्राशय वह अंग है जहां मूत्र को जमा किया जाता है । जैसे - जैसे मूत्र इकट्ठा होता है । वैसे - वैसे मूत्राशय बड़ा होता रहता है । पर्याप्त मूत्र जमा होने पर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र द्वारा ऐच्छिक संदेश मूत्राशय को प्राप्त होता है । ये संदेश मूत्राशय की पेशियों का संकुचन करता है । तथा मूत्राशयी अवरोधिनी में शिथिलन पैदा करता है । इससे मूत्र का उत्सर्जन होता है । मूत्रण को संम्पन्न करने वाली तंत्रिका को मूत्रण प्रतिवर्त कहा जाता है । वृक्क द्वारा साफ किए गए रक्त को वृक्क शिरा ले कर जाती है ।

उत्सर्जन में प्रयुक्त अन्य तंत्र

वृक्क के अलावा हमारे फेफड़े , त्वचा , यकृत आदि भी अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जित करने में मदद करते है । फेफड़े CO2 , का तथा यकृत बिलीरूबिन , बिलीविरडिन , विटामिन , स्टीरायेंड हार्मोन आदि का मल के साथ उत्सर्जन करने में मदद करता है । त्वचा नमक , यूरिया , लैक्टिक अम्ल आदि का पसीने के साथ तथा स्टेरोल , हाइड्रोकार्बन आदि का सीबम के साथ उत्सर्जन करती है ।

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