मानव पाचन तंत्र ( Human Digestive System )

महत्वपूर्ण बिंदु

( 1 ) पाचन तंत्र ( Digestive system ) - भोजन के अन्तर्ग्रहण से लेकर मल त्याग तक एक तंत्र जिसमें अनेक अंग , ग्रन्थियाँ आदि सम्मिलित हैं , सामंजस्य के साथ कार्य करते हैं । यह पाचन तंत्र कहलाता है ।

( 2 ) पाचन ( Digestion ) - जटिल पोषक पदार्थों व बड़े अणुओं को विभिन्न रासायनिक क्रियाओं तथा एंजाइमों की सहायता से सरल , छोटे व घुलनशील पदार्थों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को पाचन कहते हैं ।

( 3 ) आहार नाल ( Alimentary Canal ) - इसे पोषण नाल भी कहते हैं । इसकी लम्बाई करीब 8 - 10 मीटर होती है । आहार नाल के प्रमुख भाग निम्न हैं —

  • ( i ) मुख
  • ( ii ) ग्रसनी
  • ( iii ) ग्रासनली
  • ( iv ) आमाशय
  • ( V ) छोटी आँत
  • ( vi ) बड़ी आँत
  • ( vii ) मल द्वार ।

( 4 ) पाचन ग्रन्थियाँ - ये तीन प्रकार की होती हैं -

  • ( i ) लार ग्रन्थि
  • ( ii ) यकृत ग्रन्थि
  • ( iii ) अग्नयाशय

( 5 ) संवरणी पेशियाँ ( Sphincters ) - विभिन्न स्तरों पर संवरणी पेशियाँ भोजन , पाचित भोजन रस व अवशिष्ट की गति को नियंत्रित करती हैं ।

( 6 ) दाँत - मुख में चार प्रकार के दाँत पाये जाते हैं –

1 . कृन्तक ( Incisors )
2 . रदनक ( Carines )
3 . अग्र चर्वणक ( Premolars )
4 . चर्वणक ( molars )

मानव में मसूड़ों तथा दाँतों की स्थिति को गर्तदन्ती ( Thecodont ) कहते हैं । मनुष्य में द्विबारदंती ( Diphyodont )व विषमदंती दाँत पाये जाते हैं | मुख गुहा में 32 दाँत पाये जाते हैं । ( उपरी जबड़े में 16 व निचले जबड़े में 16 )

( 7 ) ग्रसनी ( Pharynx ) अपनी संरचना से ये सुनिश्चित करती है कि भोजन श्वास नाल में तथा वायु ग्रास नाल में प्रविष्ट ना हो पाए । ग्रसनी को तीन भागों में विभक्त किया गया है -

  • ( i ) नासाग्रसनी ( nasopharynx )
  • ( ii ) मुख ग्रसनी ( Orophar ynx )
  • ( iii ) कंठ ग्रसनी ( Laryng opharynx )

( 8 ) आमाशय ( Stomach ) - इसका आकार J जैसा होता है । यह 1 से 3 लीटर तक आहार को धारित कर सकता है । आमाशय को तीन भागों में विभक्त किया गया है -

  • ( i ) कार्डियक या जठरागम भाग
  • ( ii ) जठर निर्गमी भाग
  • ( iii ) फंडिस भाग

( 9 ) छोटी आँत ( Small Intestine ) - भोजन का सर्वाधिक पाचन तथा अवशोषण छोटी आँत में होता है । छोटी आंत को तीन भागों में विभक्त किया गया है — ग्रहनी , अग्रक्षुद्रांत्र तथा क्षुद्रांत्र ।

( 10 ) बड़ी आँत ( Large Intestine ) - यह मुख्य रूप से जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर अपचित भोजन को मलद्वार से उत्सर्जित करती है । बड़ी आँत भी तीन भागों में विभक्त होती है -

  • ( i ) अधान्त्र अथवा अंधनाल
  • ( ii ) वृहदान्त्र
  • ( iii ) मलाशय

( 11 ) पाचन ग्रन्थियाँ ( Digestive Glands ) - पाचन तंत्र में कुछ पाचन ग्रन्थियाँ भी पाई जाती हैं , जैसे – लार ग्रन्थि , यकृत तथा अग्नाशय । ये ग्रन्थियाँ पाचक रसों द्वारा भोजन के पाचन में सहायता करती हैं । छोटी आँत आदि अंग भी पाचक रसों का स्रावण करते हैं ।

( 12 ) लार ग्रन्थि ( Salivary Gland ) - इनके द्वारा लार का स्रावण किया जाता है । लार का मुख्य कार्य भोजन में उपस्थित स्टार्च का पाचन करना , भोजन को चिकना व घुलनशील बनाना तथा दाँतों , मुखगुहिका व जीभ की सफाई करना है । लार ग्रन्थि तीन प्रकार की होती है -

  • ( i ) कर्णपूर्व ग्रन्थि
  • ( ii ) अधोजम्भ / अवचिबुकीय लार ग्रन्थि
  • ( iii ) अधोजिह्वा ग्रन्थि

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विस्तृत विवरण

मानव भोजन के द्वारा शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा एंव कायिक पदार्थ प्राप्त करता है । भोजन विभिन्न घटकों जैसे प्रोटीन , कोर्बोहाइड्रेट , वसा , विटामिन , खनिज व लवण आदि से बना होता है । भोजन में इनमें से अधिकतर घटक जटिल । अवस्था में होते हैं । शरीर में अवशोषण हेतु इन्हे सरलीकृत किया जाता है । इस प्रक्रिया को संपादित करने हेतु भोजन के अन्तर्गहण से लेकर मल त्याग तक एक तंत्र जिसमें अनेकों अंग , ग्रंथियाँ आदि सम्मिलित हैं , सामंजस्य के साथ कार्य करते है । यह तंत्र पाचन तंत्र कहलाता है । पाचन में भोजन के जटिल पोषक पदार्थों व बड़े अणुओं को विभिन्न रासायनिक क्रियाओं तथा एंजाइमों की सहायता से सरल , छोटे व घुलनशील पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है ।

human digestive system in hindi

पाचन तंत्र में सम्मिलित अंग व ग्रंथियां निम्नलिखित हैं -

( अ ) अंग
( 1 ) मुख ( Mouth )
( 2 ) ग्रसनी ( Pharynx )
( 3 ) ग्रासनली ( Oesophagus )
( 4 ) आमाशय ( Stomach )
( 5 ) छोटी आंत ( Small intestine )
( 6 ) बड़ी आंत ( Large intestine )
( 7 ) मलद्वार ( Rectum )
( ब ) ग्रन्थियाँ
( 1 ) लार ग्रन्थि ( Salivary gland )
( 2 ) यकृत ग्रन्थि ( Liver )
( 3 ) अग्नाशय ( Pancreas )

सभी अंग मिल कर आहारनाल ( Alimentary Canal ) का निर्माण करते हैं जो मुख से शुरू हो कर मलद्वार तक जाती है ।यह करीब 8 - 10 मी . तक लंम्बी होती है । इसे पोषण नाल ( Digestive canal ) भी कहा जाता है ।

आहार नाल के तीन प्रमुख कार्य होते है -

( क ) आहार को सरलीकृत कर पचाना
( ख ) पचित आहार का अवशोषण
( ग ) आहार को मुख से मलद्वार तक पहुंचाना

पाचन कार्य को करने के लिए आहार नाल में पाए जाने वाली ग्रन्थियों या अन्यत्र उपस्थित ग्रन्थियों द्वारा उत्पन्न पाचक रस ( Digestive Juices ) उत्तरदायी होते हैं । ये पाचक रस विभिन्न रसायनिक क्रियाओं द्वारा भोजन को सरलीकृत कर उसे शरीर द्वारा ग्रहण किए जाने वाले रूप में परिवर्तित करते हैं । पाचित भोजन रस में कई घटक पाए जाते हैं जैसे प्रोटीन , कार्बोहाइड्रेट , वसा , खनिज , लवण , विटामिन , जल आदि । इन पोषक तत्वों को आहार नाल के विभिन्न घटक विशेष कोशिकाओं की मदद से अवशोषित करते हैं । मुख से ग्रसित भोजन अपनी लंबी यात्रा में विभिन्न पेशियों के संकुचन व विस्तार से गति करता है । विभिन्न स्तरों पर संवरणी पेशियाँ ( Sphincters ) भोजन , पाचित भोजन रस तथा अवशिष्ट की गति को नियंत्रित करती है ।

[I] पाचन कार्य में प्रयुक्त होने वाले अंग ( Organs used in Digestive System )

जैसा की आपको विदित है कि पाचन कार्य में मुख से लेकर मलद्वार तक अनेकों अंग कार्य करते हैं ( चित्र) । अब हम इन अंगों के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे ।

1.मुख ( Mouth )

आहारनाल का अग्र भाग मुख से प्रारंभ होकर मुख - गुहा में खुलता है । यह एक कटोरे नुमा ( Boul shaped ) अंग है । इसके ऊपर कठोर तथा नीचे कोमल तालु पाए जाते है । मुख गुहा में ही चारों ओर गति कर सकने वाली पेशी निर्मित जिह्वा पाई जाती है । जिह्वा मुख गुहा के पृष्ठ भाग में आधार तल से फेनुलम लिंगुअल ( Frenulum lingual ) या जिह्वा ऐनुलम के द्वारा जुडी जाती है तथा मुख गुहा के मध्य भाग तक जाती है |

मुख दो मॉसल होठो से घिरा रहता है जो मुख को खोलने - बंद करने तथा भोजन को पकड़ने में सहायक होते है । मुख के ऊपर व नीचे के भाग में एक - एक जबड़े में 16 - 16 दाँत पाए जाते है । सभी दाँत जबड़े में पाए जाने वाले एक साँचे में स्थित होते हैं ।

इस साँचे को मसूड़ा ( Gum ) कहा जाता है । मसूड़ो तथा दाँतों की इस स्थिति को गर्तदंती ( Thecolout ) कहा जाता है । मानवों में द्विबारदंती ( Diphyodont ) दाँत व्यवस्था पाई जाती है जिसमें जीवन काल में दो प्रकार के दाँत – अस्थायी ( दूध के दाँत ) तथा स्थायी पाए जाते हैं ।

दाँत चार प्रकार के होते हैं -

( अ ) कृंतक ( Incisors ) - ये सबसे आगे के दाँत होते है । जो कुतरने तथा काटने का कार्य करते है । ये छः माह की उम्र में निकलते हैं ।

( ब ) रदनक ( Canines ) - ये दाँत भोजन को चीरने – फाड़ने का कार्य करते हैं । ये 16 - 20 माह की उम्र में निकलते हैं । ये प्रत्येक जबड़े में 2 - 2 होते है । मांसाहारी पशुओं में ये ज्यादा विकसित होते हैं ।

( स ) अग्र - चवर्णक ( Premolars ) - ये भोजन को चबाने में सहायक होते हैं तथा प्रत्येक जबड़े में 4 - 4 पाए जाते हैं । ये 10 - 11 वर्ष की उम्र में पूर्ण रूप से विकसित होते हैं ।

( द ) चवर्णक ( Molars ) - ये दंत भी भोजन चबाने में सहायक होते हैं तथा प्रत्येक जबड़े में 6 - 6 पाए जाते हैं । प्रथमतः ये 12 से 15 माह की उम्र में निकलते हैं ।

2.ग्रसनी ( Pharynx )

मुख गुहा जिह्वा व तालु ( Palate ) के पिछले भाग में एक छोटी सी कुप्पीनुमा ( Sac or flask shaped ) ग्रसनी से जुड़ी होती है । ग्रसनी से होकर भोजन आहार नलिका या ग्रासनाल तथा वायु श्वासनाल में जाती है । ग्रसनी अपनी संरचना से ये सुनिचित करती है कि किसी भी सूरत में भोजन श्वासनाल में तथा वायु भोजन नाल में प्रवेश ना कर सके । इन दोनों नालों के मुख ग्रसनी के नीचे की तरफ होते हैं - अग्र भाग में श्वासनाल तथा पृष्ठ भाग में ग्रासनाल स्थित होती हैं । ग्रसनी की संरचना को तीन भागों में विभक्त किया जाता हैं -

( अ ) नासाग्रसनी ( Nasopharynx )
( ब ) मुख – ग्रसनी ( Oropharynx )
( स ) कंठ - ग्रसनी या अधो - ग्रसनी ( Laryngopharynx or Hypopharynx )

3.ग्रासनली ( Ocsophagus )

यह एक संकरी पेशीय नली हैं जो करीब 25 सेंटीमीटर लंबी होती है । यह ग्रसनी के निचले भाग से प्रांरभ होकर ग्रीवा ( Cervix ) तथा वक्षस्थल से होती हुई मध्यपट ( Diaphragm ) से निकल कर उदरगुहा में प्रवेश करती है । इस का मुख्य काम भोजन को मुख गुहा से आमाशय में पहुंचाना है ।

ग्रासनली में कुछ श्लेष्मा ग्रंन्थियाँ मिलती है । इन ग्रन्थियों से स्त्रावित श्लेष्म भोजन को लसदार बनाता है । ग्रासनली में । उपस्थित भित्तियाँ भोजन को एक प्रकार की गति क्रंमाकुचन गति ( Peristalsis ) प्रदान करती है जिसके माध्यम से भोजन आमाशय तक पहुंचता है । ग्रासनली के शीर्ष पर ऊतकों को एक पल्ला ( Flap ) होता है । यह पल्ला घाटी ढक्कन या एपिग्लॉटिस ( Epiglottis ) कहलाता है ।

भोजन निगलने के दौरान यह पल्ला बंद हो जाता है तथा । भोजन को श्वासनली में प्रवेश करने से रोकता है ।

4.आमाशय ( Stomach )

आहारनाल का ग्रासनली से आगे का भाग आमाशय हैं । यह एक पेशीय J – आकार की संरचना है जो ग्रासनली द्र ग्रहणी ( Duodenum ) के मध्य तथा उदरगुहा ( Abdominal Cavity ) के बाएं हिस्से तथा मध्यपट के पीछे स्थित होता है । यह एक लचीला अंग है जो एक से तीन लीटर तक आहार धारित कर सकता है आमाशय को तीन भागों में बाँटा जा सकता है -

( अ ) कार्डियक या जठरागम भाग : यह बांया बड़ा भाग है जहाँ से ग्रसिका आमाशय में प्रविष्ट होती है ।
( ब ) जठर निर्गमी भाग : यह आमाशय का दाहिना छोटा भाग है जहाँ से आमाशय छोटी आँत से जुड़ता है ।
( स ) फंडिस भाग : यह उपरोक्त वर्णित दोनों भागो के मध्य की संरचना है ।

आमाशय में दो अवरोधिनी या संकोचक पेशियाँ ( Sphincters ) पाई जाती है । ये दोनों पेशियाँ आमाशय की साम्रगी को अंतर्विष्ट करती हैं -

( अ ) ग्रास नलिका अवरोधनी ( Cardiac or lower sophageal sphincter ) - यह ग्रसिका व आमाशय को विभाजित करती है तथा आमाशय से अम्लीय भोजन को ग्रसनी में जाने से रोकती है ।
( ब ) जठरनिर्गमीय अवरोधिनी ( Pyloric sphincter ) - आमाशय व छोटी आँत को विभाजित करती है तथा आमाशय से छोटी आंत्र में भोजन निकास को नियंत्रित करती है ।

5.छोटी आंत ( Small intestine )

छोटी आँत पाचन तंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है । जो आमाशय के जठरनिर्गमी ( Pyloric ) भाग से शुरू होकर बड़ी आंत पर पूर्ण होती है । मानव में इसकी औसत लंबाई सात मीटर होती है तथा आहार नाल के इस अंग द्वारा ही भोजन का सर्वाधिक पाचन तथा अवशोषण होता है । छोटी आंत को तीन भागों में विभक्त किया गया है -

( अ ) ग्रहनी ( Duodenum ) - आमाशय से जुड़ा हुआ यह छोटी आंत का पहला तथा सबसे छोटा भाग है जो भोजन के रसायनिक पाचन ( एंजाइमों द्वारा ) में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं ( सारणी ) ।

( ब ) अग्रक्षुदांत्र ( Jejunum ) - यह छोटी आंत का मध्य भाग है । यहाँ ग्रहणी में पाचित आहार रस का अवशोषण किया जाता है । मुख्यतः अवशोषण का कार्य विशेष प्रकार की कोशिकाओं जिन्हे आन्त्रकोशिका ( Enterocyte ) कहा जाता है के द्वारा संपादित किया जाता है ।

( स ) क्षुदांत्र ( Ileum ) - यह छोटी आंत का अंतिम भाग है जो बड़ी आँत में खुलता है । यह भाग उन पोषक तत्वों [ विशेष रूप से पित्त लवण ( Bile Salts ) व विटामिनों का अवशोषण करता है जो अग्रक्षुदात्र में अवशोषित नहीं हो पाते ।

6.बड़ी आंत ( Large intestine )

क्षुदांत्र आगे बड़ी आंत से जुड़ा होता है । यहां कुछ विशेष जीवाणु पाए जाते हैं । ये जीवाणु छोटी आंत से शेष बचे अपाचित भोजन को किण्वन क्रिया ( Ferimentation ) द्वारा सरलीकृत कर पाचन में मदद करते हैं । बड़ी आँत का मुख्य कार्य जल व खनिज लवणों का अवशोषण तथा अपाचित भोजन को मलद्वार से उत्सर्जित करना हैं । मनुष्यों में बड़ी आँत को तीन भागों में विभक्त किया गया है -

( अ ) अधान्त्र अथवा अंधनाल ( Cecium ) - यह भाग क्षुदांत्र से जुड़ा होता है । यहाँ क्षुदांत्र से आने वाले पाचित आहार रस का अवशोषण होता है तथा शेष बचे अपशिष्ट को आगे वृहदांत्र में पहुंचा दिया जाता है । अंधनाल के प्रथम भाग ( जो क्षुदांत्र से जुड़ा होता है ) से थोड़ा नीचे भीतर की ओर चार - पांच इंच लंबा नली के आकार का अंग निकला रहता है । इसे कृमिरूप परिशेषिका ( Vermiform appendix ) कहा जाता है ।

( ब ) वृहदान्त्र ( Colol ) - आहार नाल में बड़ी आँत का अंधात्र के आगे वाला भाग वृहदान्त्र कहलाता है । यह उल्टे U के आकार की करीब 1 . 3 मी . लम्बी नलिका होती है । वृहदांत्र चार भागों में विभक्त होती है -

( 1 ) आरोही वृहदान्त्र ( Asending colon ) - करीब 15 से . मी . लम्बी नलिका
( 2 ) अनुप्रस्थ वृहदान्त्र ( Transverse colon ) - करीब 50 से . मी . लम्बी नलिका
( 3 ) अवरोही वृहदान्त्र ( Descending colon ) - करीब 25 सें . मी . लम्बी नलिका
( 4 ) सिग्माकार वृहदान्त्र ( Sigmoid colon ) - करीब 40 से . मी . नलिका

( स ) मलाशय ( Recturn )- मलाशय आहारनाल का अंतिम भाग होता है । यह करीब 20 से . मी . लम्बा होता है । मलाशय के अंतिम 3 से . मी . वाले भाग को गुदानाल ( Anal canal ) कहा जाता है । गुदानाल मलद्वार ( Anus ) के रास्ते बाहर खुलता है । मलद्वारा पर आकार आहारनाल समाप्त होती हैं । गुदानाल में दो संवरणी बहिः और अंतः सवंरणी ( Sphicters ) पाए जाती है । पाचित आहार रस के अवशोषण के पश्चात् शेष रहे अपशिष्ट पदार्थों के बाहर निकलने की प्रक्रिया को ये संवरणी पेशियाँ नियंत्रित करती है ।

[II] पाचन ग्रन्थियाँ ( Digestive glands )

मनुष्यों में आहारानाल के अंगों में उपस्थित ग्रन्थियों के अलावा तीन प्रमुख पचन ग्रंथियां यथा लार ग्रन्थि ( Salivary gland ) , यकृत ( Liver ) व अग्न्याशय ( Pancrease ) पाई जाती है ।

1.लार ग्रन्थि ( Salivary Gland )

यह ग्रन्थि मुंह में लार उत्पन्न करती है । लार एक सीरमी तरल तथा एक चिपचिपे श्लेष्मा का मिश्रण होता है । तरल भाग भोजन को गीला करता है तथा श्लेष्मा लुब्रिकेंट के तौर पर कार्य करता है । लार का मुख्य कार्य भोजन में उपस्थित स्टार्च का मुख में पाचन शुरू करना , भोजन को चिकना व धुलनशील बनाना तथा दाँतों , मुख ग्रहिका व जीभ की सफाई करना है । लार ग्रन्थि तीन प्रकार की होती है ।

( अ ) कर्णपूर्व ग्रन्थि ( Parotid gland ) - यह सीरमी तरल का स्त्राव करती है तथा गालो में पाई जाती है ।
( ब ) अधोजंभ / अवचिबुकीय लार ग्रंन्थि ( Sub mandibular salivary gland ) - यह एक मिश्रित ग्रन्थि है । जिससे तरल तथा श्लेष्मिक स्रावण होता है ।
( स ) अधोजिह्वा ग्रन्थि ( Sublingual gland ) - यह जिह्वा के नीचे पाई जाती है तथा श्लेष्मिक स्रावण करती है ।

2.अग्न्याशय ( Pancrease )

यह एक मिश्रित ग्रन्थि है जो अंतः स्त्रावी हॉर्मोन इंसुलिन ( Insulin ) व ग्लुकेगोन ( Glucagon ) तथा बहिः स्त्रावी अग्न्याशयी रस का स्रावण करती है । यह ग्रन्थि यकृत , ग्रसनी तथा तिल्ली से घिरी होती है । यह 6 से 8 इंच लम्बी तथा U आकार की होती है। इस ग्रन्थि के द्वारा स्त्रावित एंजाइम ( सारणी ) आंतों में प्रोटीन , वसा तथा कार्बोहाइड्रेट के पाचन में मदद करते है । इंसुलिन तथा ग्लुकेगोन हॉर्मोन मिल कर शरीर में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करते हैं ।

यह मानव शरीर में उपस्थित सबसे महत्वपूर्ण पाचक ग्रंथि है |यह मध्यपट के नीचे स्थित लगभग त्रिकोणाकार अंग है इसका अधिकतम वजन दायीं ओर होता है । सामने से देखने पर यकृत दो भागों – दायीं और बांयी पालियों में विभाजित नजर आता है । अग्र सतह से तल की तरफ देखने पर दो अतिरिक्त पालियाँ दिखाई देती है । यकृत करीब 100 , 000 छोटी षट्कोणीय संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाइयों जिन्हे यकृत पालिकाएँ ( Liver lobules ) कहा जाता है से निर्मित होती है । यह ग्रन्थि पित्त का निर्माण करती है । यहाँ से पित यकृत वाहिनी उपतंत्र ( Hapatic duct system ) तथा पित्त वाहिनी ( Bile duct ) द्वारा पित्ताशय ( Gall bladder ) में चला जाता है । पित्ताशय यकृत के अवतल में स्थित होता है । पित्ताशय पित्त का भंडारण / संचय करता है । यहाँ से पित्ताशयो नलिका द्वारा पित्त ग्रसनी में चला जाता है ।

[III] भोजन का पाचन ( Digestion of food )

भोजन के पाचन की क्रिया कई यांत्रिक एंव रसायनिक प्रक्रियों द्वारा संपन्न होती है । आहारनाल के भीतर विभिन्न अंगों एवं ग्रन्थियों से स्त्रावित एन्जाइम भोजन के पोषक तत्वों का जल अपघटन कर सरलीकृत करते हैं । ये एन्जाइम सामान्यतः हाइड्रोलेसेज वर्ग के हैं । पाचन में कार्य करने वाले प्रमुख एन्जाइम निम्न प्रकार से है -

( i ) कार्बोहाइड्रेट पाचक - एमिलेज , माल्टेज , सुक्रेज आदि ।
( ii ) प्रोटीन पाचक - ट्रिप्सिन , काइमो - ट्रिप्सिन , पेप्सिन आदि ।
( iii ) वसा पाचक - लाइपेज ।
( iv ) न्यूक्लिएर्जज - न्यूक्लियोटाइटेज , न्यूक्लिएजेज ।

भोजन को चबाने व लार के साथ मिलाने का कार्य मुख गुहा में संपादित किया जाता है । लार का श्लेष्म भोजन के कणो को चिकना कर उन्हे चिपकाने में मदद करता है । भोजन अब बोलस के रूप में क्रमाकुंचन ( Peristalsis ) गति द्वारा ग्रसनी से ग्रसिका तथा ग्रसिका से आमाशय में पहुंचता है । आमाशय में भोजन के प्रवेश को जठर - ग्रसिका अवरोधिनी नियंत्रित करती है । लार में उपस्थित एंजाइम टायलिन या एमाइलेज मुख - गुहा में ही कार्बोहाइड्रेट का जल अपघटन शुरू कर देते है । यहाँ करीब 30 प्रतिशत स्टार्च को माल्टोज में अपघटित कर दिया जाता है । आमाशय में तीन प्रकार के स्त्राव - म्यूकस , प्रोएजांइम पेप्सिनोजन तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल पाए जाते है । म्यूकस श्लेष्मा ग्रीवा कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित किया जाता है । प्रोएंजाइम पेप्सिनोजन हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा तैयार अम्लीय वातावरण में सक्रिय एंजाइम पेप्सिन में परिवर्तित हो जाता है । तथा भोजन में उपस्थित प्रोटीन का अपघटन करता है । नवजात शिशुओं में पेप्सिन के साथ जठर रस में रेनिन नामक एंजाइम भी पाया जाता है । यह दुग्ध प्रोटीन के पाचन में मदद करता है ।

ऑक्सिन्टिक कोशिकाएँ ( Oxyntic Cells ) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्रावण करती हैं । आमाशय में भोजन कुछ घंटों तक संग्राहित रहता है तथा पेशीय संकुचन द्वारा जठर रस से मिश्रित होकर काइम ( Chyme ) का निर्माण करता है ।

आमाशय से भोजन छोटी आँत में पहुँचता है । सर्वाधिक पाचन क्रिया ग्रहणी में संपन्न होती है । यहाँ विभिन्न नलिकाओं द्वारा अग्न्याशयी रस , पित्त लवण तथा आंत्र रस छोड़े जाते हैं । | इन रसों में विभिन्न एंजाइम होते हैं जो भोजन में उपस्थित विभिन्न पोषक तत्वों का पाचन करते हैं ।

पित्त वसा का पायसीयन ( Emulsification ) करता है । | यह वसा पाचन के लिए आवश्यक है । साथ ही पित्त लाइपेज एंजाइम को भी सक्रिय करता है । ग्रहणी में सरलीकृत पदार्थ छोटी आंत के अग्रक्षुद्रांत और क्षुद्रांत भाग में अवशोषित किए जाते है । अवशेषित पदार्थों को विभिन्न कोशिकाओं की सहायता से रक्त में पहुँचाया जाता है ।अपचित तथा अनावशोषित पदार्थ क्षुदांत्र से बड़ी आंत में जाते हैं । बड़ी आंत का मुख्य काम जल तथा लवण का अवशोषण तथा शेष रहे अपचित भाग का उत्सर्जन है । अपचित भाग ठोस होकर अस्थायी रूप से मलाशय में रहता है । एक तांत्रिक प्रतिवर्ती ( neural reflex ) के कारण मलद्वार से मल का बहिक्षेपण होता है ।

विभिन्न पाचन अंगों द्वारा स्त्रावित पाचन रस तथा उनके कार्य
क्र . सं . पाचन रस को स्त्रावित करने वाला अंग या ग्रन्थि स्त्रावित एंजाइम कार्य ( जटिल → सरलीकृत ) कार्य स्थल
1. लार ग्रन्थि टायलिन ( Ptylin ) या
एमिलेज ( Amylase )
पॉलिसैकराइड ( जैसे स्टार्च , ग्लाइकोजन ) → छोटे पॉलि सैकेराइड , माल्टोस मुख गुहा
2. आमाशय ( जठर रस ) 1 . पेप्सिन ( Pepsin )
2 . रेनिन ( Renin )
1 . प्रोटीन → पेप्टाइड
2 . केसीन → पैराकेसीन
आमाशय
3. अग्न्याशय 1 . एमिलेज ( Armylase )
2 . ट्रिप्सिन ( Trypsin )
3 . काइमोट्रिप्सिन ( Chymotrypsin )
4 . कार्बोक्सिपेप्टाइडेज ( Carboxypeptidase )
5 . लाइपेज ( Lipase )
6 . न्यूक्लिएजेज ( Nucleases )
1 . स्टार्च → माल्टोस
2 . प्रोटीन → पेप्टाइड
3 . प्रोटीन → पेप्टाइड
4 . प्रोटीन , पेप्टाइड अमीनो अम्ल
5 . वसा → मोनोग्लिसराइड , वसीय अम्ल
6 . डी . एन . ए . व आर . एन . ए . → न्यूक्लिओटाइड
छोटी आँत
4. आन्त्रीय रस 1 . माल्टेज ( Maltose )
2 . लैक्टेस ( Lactase )
3 . सुक्रेस ( Sucrase )
4 . लाइपेज ( Lipase )
5 . न्यूक्लिएजेज ( Nucleases )
6 . डाइपेप्टाइडेज ( Dipeptidase )
7 . फोस्फेटेज ( Phosphatase )
1 . माल्टोस → ग्लूकोस
2 . लैक्टोस → ग्लूकोस
3 . सुक्रोस → ग्लूकोस
4 . वसा → वसीय अम्ल तथा ग्लिसरोल
5 . न्यूक्लिक अम्ल व न्यूक्लिओटाइड → न्यूक्लिओसाइड व शर्करा
6 . डाइपेप्टाइड → अमीनो अम्ल
7 . न्यूक्लिओटाइड → नाइट्रोजन क्षार , राइबोज
छोटी आँत
5. यकृत पित्त लवण वसा → वसीय अन्ल / वसा गोलिका छोटी आँत

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