अशोक के धम्म की विशेषतायें

ashok ke dhamm

यद्यपि अशोक का व्यक्तिगत धर्म बौद्ध धर्म था , परन्तु उसने अपनी प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए कुछ नैतिक सिद्धान्तों का प्रसार किया , जिन्हें सामूहिक रूप से ' अशोक का धम्म ' कहा जाता है । अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की , उसे ही उसके अभिलेखों में ' धम्म ' कहा गया है । अशोक अपनी प्रजा के लौकिक जीवन को ही नहीं , अपितु पारलौकिक जीवन को भी सुधारना चाहता था । अतः इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने ' धम्म ' की स्थापना की ।

अशोक के धम्म की विशेषतायें

अशोक के धम्म का उद्देश्य बाहरी रूप से मनुष्य के आचरण को पवित्र बनाना और आन्तरिक रूप से उसकी आत्मा को शुद्ध करना था । अशोक के धार्मिक सिद्धान्तों का विश्लेषण करने पर हमें उसके अंतर्गत निम्नलिखित विशेषतायें दृष्टिगत होती है -

1 . सार्वभौमिकता - उसका धम्म सार्वभौम था । उसमें साम्प्रदायिकता या अन्य किसी प्रकार के संकीर्ण विचारों को जरा भी स्थान प्राप्त नही था । उसके ये नियम सभी धर्मों को समान रूप से मान्य थे । वह समस्त विश्व को एक कुटुम्ब मानता था और सम्पूर्ण मानव जाति की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहता था ।

2 . सभी धर्मों का सार - उसके धम्म में केवल सभी धर्मों के सार पर जोर दिया गया था । उसे बाहरी आडम्बर , थोथे क्रिया कलापों तथा दार्शनिक सिद्धान्तो के जाल से दूर रखने का प्रयास किया था ।

3 . नैतिकता पर बल - अशोक का धम्म पूर्णतया शुद्ध नैतिक धर्म था । इसमें व्यक्ति के शुद्ध आचरण पर विशेष जोर दिया गया था । इसका एकमात्र संबंध मनुष्यों के आचरण से था ।

4 . धार्मिक सहिष्णुता - यह धम्म पुर्णतया उदार था । अशोक के धम्म में इस बात पर बल दिया गया है कि सभी धर्मों का आदर करना । चाहिए तथा अन्य धर्मों की निन्दा नही करनी चाहिए ।

5 . अहिंसा - अशोक ने अहिंसा के सिद्धान्त के पालन पर अत्यधिक बल दिया । उसने पशु - पक्षियों के वध पर प्रतिबन्ध लगा दिया और हिंसात्मक यज्ञ बन्द करवा दिया ।

6 . धार्मिक पाखण्ड़ों और आडम्बरों का अभाव - अशोक के धम्म में कर्मकाण्डों , धार्मिक पाखण्डों तथा आडम्बरों का अभाव था । उसने जन्म , मृत्यु , विवाह आदि के अवसरों पर धार्मिक अनुष्ठान किये जाने की निन्दा की तथा धर्म - मंगल अर्थात् सच्चे । रीति रिवाजों पर बल दिया । व्यावहारिकता - अशोक का धम्म एक सैद्धान्तिक कल्पना या आदर्श मात्र नही था , वह एक व्यावहारिक सत्य था जिसे अशोक ने स्वयं अपने जीवन में क्रियान्वित किया था ।


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