(PDF) पादपों में जल अवशोषण व रसारोहण ( Water Absorption & Ascent Of Sap In Plants )

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पादपों में जल अवशोषण एक महत्वपूर्ण क्रिया है जो जड़ों द्वारा सम्पन्न होती है ।

पादप विभिन्न पदार्थो का भूमि से अवशोषण एवं वितरण उनके जलीय विलयन के रूप में करते हैं ।

मृदा कणों के बीच स्थित रिक्त स्थानों में स्थित जल केशिकीय जल ( Capillary water ) कहलाता है ।

केशिकीय जल का प्राप्य जल ( Available Water ) भी कहते हैं ।पौधे इसी जल को सुगमता से अवशोषित करते हैं ।

पौधों की जड़ो का मूल रोम क्षेत्र ही जल अवशोषण करने वाला मुख्य भाग है ।

रैनर ( Renner ) ने जल अवशोषण क्रिया को दो भागों में विभक्त किया -
( i ) सक्रिय जल अवशोषण
( ii ) निष्क्रिय जल अवशोषण

क्रेमर ( Kramer 1949 ) ने इस क्रिया का विस्तार पूर्वक अध्ययन किया तथा बताया कि दोनों क्रियायें एक दूसरे से स्वतन्त्र होती हैं ।

जब जल अवशोषण के कारक पादप के वायवीय भागों में स्थित होते हैं तथा मूल की कोशिकाएँ केवल मार्ग प्रदान करने का कार्य करती है तो इसे निष्क्रिय जल अवशोषण कहते हैं । जब जल अवशोषण के कारक मूल में उपस्थित होते हैं तथा मल की कोशिकायें इस क्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं तो इसे सक्रिय जल अवशोषण कहते हैं । इस क्रिया में कोशिकीय ऊर्जा का उपयोग होता है ।

मृदा जल मूल रोम में अन्तः परासरण क्रिया द्वारा प्रवेश करता है । मूल रोम व अधिचर्म कोशिकाओं से जल का वल्कुट कोशिकाओं में से होते हुए जायलम वाहिकाओं तक जाने की क्रिया पर्श्वीय प्रवाह ( Lateral Flow ) कहलयाती हैं ।

पार्श्वीय प्रवाह तीन पथों द्वारा होता है -
( i ) एपोप्लास्ट पथ
( ii ) सिमप्लास्ट पथ
( iii ) रसधानी पथ

मृदा में जल की अत्यधिक मात्रा का भराव होने से मृदा का वातन ( soil aeration ) कम हो जाता है । इस अवस्था को जलाक्रान्ति ( water legging ) कहते हैं । ऐसी अवस्था में अवशोषण की दर कम हो जाती है ।

मूल द्वारा अवशोषित जल व घुलनशील खनिज लवणों का जायलम उत्तक में गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत पौधों के वायवीय भागों तक चढ़ने की क्रिया को रसारोहण ( Ascent of sap ) कहते हैं ।

रसाराहण के जैववाद के सिद्धान्त को गोडलेवस्की तथा सर जे . सी . बोस के प्रयोग द्वारा समझाया गया है ।

रसारोहण की क्रिया से सम्बन्धित प्रस्तावित सिद्धान्तों में ससंजन तनाव सिद्धान्त या वाष्पोत्सर्जनाकर्षण सिद्धान्त वर्तमान में सबसे अधिक मान्य सिद्धान्त है ।

डिक्सन व जौली ( Dixson and Jolly 1894 ) ने ससंजन तनाव सिद्धान्त या वाष्पोत्सर्जनाकर्षण सिद्धान्त प्रस्तावित किया है ।

केशिका जल ( Capillary water ) मृदा जल पादपों को सुगमता से उपलब्ध होता है ।

ब्रायोफाइट्स में जल अवशोषण पादप शरीर के मूलाभास ( Rhizoids ) द्वारा किया जाता है ।

मूल के तरुण का मूल रोम क्षेत्र ( Root hair region ) भाग मुख्यरूप से जल अवशोषण का कार्य करता है ।

क्रेमर के अनुसार पादपों में जल अवशोषण दो प्रकार का होता है -
- 1 . निष्क्रिय जल अवशोषण
2 . सक्रिय जल अवशोषण ।

सक्रिय जल अवशोषण - जब जल अवशोषण के कारक मूल में ही उपस्थित हो तथा मूल की कोशिकाएं जल अवशोषण में सक्रिय रूप से भाग लेती है तो इसे सक्रिय अवशोषण कहते हैं । ( 2 - 4 % जल )

निष्क्रिय जल अवशोषण - जब जल अवशोषण के कारक वाष्पोत्सर्जी पृष्ठ या पर्णों में स्थित होते हैं तथा मूल की कोशिकाएं केवल मार्ग का कार्य करती है तो इसे निष्क्रिय जल अवशोषण कहते हैं ।

अधिकांश पादपों द्वारा मुख्य रूप से निष्क्रिय या निश्चेष्ट जल अवशोषण विधि द्वारा ( 96 - 98 % जल ) जल अवशोषण होता है ।

पार्श्वीय प्रवाह - जल का मूलरोम से जायलम तक जल के प्रवाह को पाीय प्रवाह ( Lateral flow ) कहते हैं ।

जल का पार्श्वीय प्रवाह के मार्ग में तीन प्रकार के होते हैं -
1 . एपोप्लास्ट
2 . सिमप्लास्ट
3 . रसधानीय पथ ।

पादपों के पार्श्वीय जल प्रवाह के संलयक या सिमप्लास्ट पथ को सजीव पथ भी कहा जाता है ।

जल धारण क्षमता या क्षेत्र क्षमता - गुरुत्व बल द्वारा मृदा से निष्कासित अतिरिक्त जल की मात्रा के पश्चात् मृदा में शेष बची जल की मात्रा का जल धारण क्षमता कहते हैं ।

स्थायी म्लानी प्रतिशतता - जब मृदा में उगे हुए पादप की पत्तियाँ पहली बार स्थायी रूप से मुरझाती है तो उस समय मृदा जल की प्रतिशतता को ही स्थायी म्लानी प्रतिशतता कहते हैं ।

रसारोहण - मृदा से जल मूलरोमों द्वारा अवशोषित होकर पादप के शीर्ष भागों तक व अन्य अंगों में तनु विलयन के रूप में पहुँचता है । जल के इस उपरिदिशिक स्थानान्तरण को रसारोहण कहते हैं ।

पादप रसारोहण से सम्बन्धित रिले पम्प नामक जैव बल सिद्धान्त गोड्लेवस्की ( 1984 ) ने दिया था ।

रसारोहण स्पंदन सिद्धान्त सर जे . सी . बोस ने प्रस्तुत किया तथा उन्होंने इसके लिए भारतीय टेलीग्राफ ( Desmodium gyrans ) नामक पादप पर प्रयोग किया था ।

संसजन तनाव सिद्धान्त या वाष्पोत्सर्जनाकर्षण या वाष्पोत्सर्जन खिंचाव सिद्धान्त डिक्सन एव जौली ( 1894 ) ने प्रस्तुत किया था ।

रसारोहण का सर्वाधिक मान्य सिद्धान्त संसजन तनाव सिद्धान्त है ।

पादपों में पार्श्वीय जल प्रवाह का सिम्प्लास्ट मार्ग सर्वाधिक प्रतिरोध वाला होता है ।

रसारोहण के दौरान जल जायलम ( वाहिकाओं व वाहिनिकाओं ) द्वारा ऊतक द्वारा ऊपर की ओर चढ़ता है ।

केशिका जल - वह जल जो कि मृदा कणों के बीच उपस्थित छिद्रों , व अत्यन्त संकरे स्थलों आदि में भरा रहता है , केशिका जल कहलाता है । यह जल मृदा में सभी ओर मृदा कणों के बीच फैला रहता है । यह जल पादपों के लिए अवशोषण का मुख्य स्रोत होता है तथा जड़ें इसका अधिकतम अवशोषण करती हैं ।

मूलरोम - मूलरोम जड़ की बाह्य त्वचा ( epiblema ) पर अतिवृद्धि के रूप में उत्पन्न होते हैं । मूल रोम जड़ की एपीब्लेमा की जिन कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं उन कोशिकाओं को ट्राइकोब्लास्ट ( Trichoblast ) कहते हैं । मूल रोम मृदा से जल अवशोषण का कार्य करते हैं ।

मूल दाब का मापन मेनोमीटर उपकरण द्वारा किया जाता है ।

मूल में मूल शीर्ष के ठीक पीछे स्थित दीर्धीकरण क्षेत्र के समीप स्थित क्षेत्र मूल रोम क्षेत्र कहलाता है । इसका प्रसार कुछ मिलीमीटर से कुछ सेन्टीमीटर तक हो सकता है । इस क्षेत्र में असंख्य मूल रोम होते हैं ।

उपलब्ध या प्राप्य मृदा जल - वर्षा से प्राप्त मदाजल का वह भाग जो मृदाकणों के अन्तरा कणिकीय स्थलों में भरा रहता है तथा जिस पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव नहीं होता . पौधों की जड़ो को अवशोषण हेतु उपलब्ध होता अतः मृदा कणों के मध्य अन्तरा कणिकीय स्थलों में स्थित जल की उपलब्ध या प्राप्य जल कहते हैं ।

तेज वर्षा होने पर जो जल बहकर , तालाब , पोखर , नदी व समत में चला जाता है उसे अपवाहित जल ( Runaway water ) कहते हैं ।

वर्षा से प्राप्त जल में से अपवाहित जल के पश्चात मृदा में बच्चा शेष जल जो मदा में अवशोषित हो जाता है मृदा जल कहलाता है । मृदाजल तीन रुपों में होता हैं -
( 1 ) गुरुत्व जल
( 2 ) आर्द्रताग्राही जल
( 3 ) कोशिकीय जल

गुरुत्व जल ( Gravitational Water ) - वर्षा से प्राप्त मृदा जल का वह भाग जो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नीचे की ओर गहराई में चला जाता है , गुरुत्वजल कहलाता हैं । यह जल एकवर्षीय पोधों की जड़ों को उपलब्ध नहीं होता है ।

आर्द्रताग्राही जल ( Hygroscopic water ) - मृदा जल का कुछ अंश मृदा में स्थित कोलाइडल पदार्थो व जलरागी पदार्थों के कणों की सतह पर अन्त : शोषण दाब द्वारा पतली परत के रुप में जमा रहता हैं । इसे आर्द्रतागाही जल कहते हैं । पौधों की जड़ें । इस जल को भी अवशोषित नहीं कर सकती है ।

केशिकीय जल - मृदा जल का वह भाग जो मृदा कणों के बीच स्थित अत्यन्त संकरे केशिकीय स्थलों में भरा रहता है तथा जिस पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव नहीं होता , केशिकीय जल कहलाता है । पौधों की जड़े इस जल को सुगमता से अवशोषित कर सकती है , अत : इस जल । को उपलब्ध या प्राप्य जल भी कहा जाता है ।

जलअवशोषण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्न है -
( 1 ) प्राप्य मृदाजल
( 2 ) मृदा विलयन की सान्द्रता
( 3 ) मृदा तापमान
( 4 ) मृदा वातन

ससंजन बल ( Cohesive force ) - किसी एक पदार्थ के दो अणुओं के बीच स्थित बल को ससंजन बल कहते हैं । इस बल के द्वारा अणु आपस में जुड़े रहते हैं ।

जब के अणुओं के बीच लगने वाले संसजन बल ( Cohesive force ) के कारण जायलम में स्थित जल अटूट स्तम्भ के रुप में बना रहता है । इस बल का मान 45 - 207 atm तक हो सकता है ।

डिक्सनजौली द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त भौतिक बल वाद के अन्तर्गत आता है ।

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