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जीव के लक्षण ( Characteristics of Organism )

jeev ke lakshan

जीव विज्ञान ( Biology ) मे सिर्फ उन्ही पदार्थो का अध्ययन किया जाता है जिनमें जीवन होता है , लेकिन व्यावहारिक तौर पर जीवन शब्द को परिभाषित कर पाना अत्यंत ही कठिन है , क्योकि जीवन अनेक जटिल क्रियाओं का परिणाम है ।

जीवित पदार्थ के अपने कुछ निश्चित लक्षण होते है , जिनके आधार पर यह समझा जाता है कि यह जीव है अर्थात् जीवन एक अमूर्त ( Abstract ) वस्तु है । इसको न तो हम देख सकते है और न ही हम स्पर्श कर सकते है , किंतु इसका अनुभव हम अवश्य कर सकते है । आधुनिक खोजों के आधार पर यह कहा जाता है कि जीवों का निर्माण करने वाले विशेष संघनित पदार्थो द्वारा प्रदर्शित प्रक्रियाओं जैसे - चलन , श्वसन , पोषण , जनन आदि की अभिव्यक्ति ही जीवन है । अतः इन प्रक्रियाओं को जैविक क्रियाएं ( Life Processes of Vital Activities ) कहते है । जीवों के विशेष लक्षण निम्नलिखित है -

1 . निश्चित संगठन ( Definite Organisation ) - जटिल जैविक संगठन जीवों के प्रमुख लक्षण है । रासायनिक अणुओं का संस्तरण कोशिकाओं में , कोशिकाओं का ऊतकों में , ऊतकों का अंगों में तथा अंगों का अंग तंत्रों में होता है , जिस कारण जीवों को निश्चित रूप व आकार प्राप्त होता है ।

2 . उपापचय ( Metabolism ) - जीवों में सभी जीवन प्रक्रियाओं जैसे - पोषण , श्वसन , वृद्धि , जनन आदि का संचालन जटिल रासायनिक पदार्थो के विघटन एवं निर्माण के समय क्रमशः उत्सर्जित एवं प्रयुक्त ऊर्जा द्वारा होता है । जीवों मे सरल रासायनिक पदार्थ एवं ऊर्जा द्वारा जटिल रासायनिक पदार्थो का निर्माण , उपाचयी परिवर्तन ( Anabolic Change ) कहलाता है । स्वांगीकरण ( Assimilation ) इसका उपयुक्त उदाहरण है । इसके विपरीत जटिल रासायनिक पदार्थो ( शर्करा , वसा , प्रोटीन ) के क्रमबद्ध विघटन से ऊर्जा का विसर्जन एवं सरल यौगिकों ( जल , कार्बन डाइ ऑक्साइड , यूरिया , यूरिक एसिड ) की निर्माणकारी प्रक्रिया उपचयी परिवर्तन ( Catabolic Change ) की श्रेणी में रखी गयी है । उपाचयी परिवर्तन से जीवद्रव्य ( Protoplasm ) का निर्माण होता है , जबकि उपचयी परिवर्तन के फलस्वरूप जीवद्रव्य का ह्रास अथवा विघटन होता रहता है । विमोचित ऊर्जा विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में प्रयुक्त होती है । आवश्यकता से अधिक प्राप्त ऊर्जा ATP ( Adenosine Tri - phosphate ) में संग्रहित कर ली जाती है ।

3 . पोषण ( Nutrition ) - जीव अपने दैनिक कार्यो के लिए आवश्यक ऊर्जा पोषण द्वारा प्राप्त करते है । पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण विधि से बनाते है , जबकि जन्तु पौधों पर ही आश्रित रहते है । निर्जीव वस्तुओं में इस प्रकार से भोजन बनाने का गुण नही होता है ।

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  • 4 . श्वसन ( Respriation ) - जीवधारियों का मुख्य लक्षण श्वसन क्रिया होता है । इस क्रिया मे जीव वायुमंडल मे उपस्थित ऑक्सीजन ( O2 ) को अपने शरीर के अंदर लेते है तथा कार्बन डाई ऑक्साइड ( CO2 ) को अपने शरीर से बाहर निकालते है । श्वसन क्रिया के दौरान वसा , कार्बोनाइट्रेड और प्रोटीन का विघटन होता है और ऊर्जा का विमोचन होता है , जिसका संग्रहण ATP के रूप में होता है ।

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  • 5 . उत्सर्जन ( Excretion ) - जीव शरीर में होने वाली उपापचय क्रियाओं के दौरान पैदा हुये हानिकारक पदार्थों जैसे - कार्बन डाई ऑक्साइड , यूरिया व अमोनिया आदि को जीवधारी शरीर से बाहर निकाल देते है । इन हानिकारक पदार्थो को बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन कहते है । अजीवित वस्तुओं में इस क्रिया को करने की क्षमता नही होती है ।

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  • 6 . वृद्धि ( Growth ) - प्रत्येक जीव प्रारम्भ में एक कोशिका ( भ्रूण अथवा सामान्य कोशिका ) अवस्था में होता है तथा धीरे - धीरे आकार में वृद्धि कर प्रोढ़ावस्था को प्राप्त करता है । इस प्रक्रिया मे जीवद्रव्य की वृद्धि होती रहती है । यह वृद्धि आन्तरिक होती है । कोशिका विभाजन द्वारा कोशिकाओं की संख्या मे निरन्तर वृद्धि होती रहती है , निर्जीवों में वृद्धि नही होती अपितु कुछ अवस्थाओं मे पदार्थो का बाह्य रूप से निक्षेपण व संघनन हो सकता है । उदाहरण - रासायनिक पदार्थो का बनना , क्रिस्टल निर्माण आदि ।

    7 . प्रजनन ( Reproduction ) - प्रत्येक जीव द्वारा अपने जैसा जीव उत्पन्न करने की क्षमता को प्रजनन कहते है । इस क्रिया द्वारा जीव अपने वंश की निरंतरता बनाये रखने में सफल रहा है । प्रजनन क्रिया , आनुवंशिक पदार्थ ( DNA , RNA ) द्वारा नियन्त्रित होती है । आनुवंशिक पदार्थ की उपस्थिति प्रत्येक जीव का महत्वपूर्ण लक्षण है ।

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  • 8 . अनुकूलन ( Adaptability ) - अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जीव में यह क्षमता होती है कि वे अपनी संरचनाओं मे कार्यों के अनुरूप परिवर्तन कर सकते है , जैसे - मछली जल में रहने के . पक्षी हवा में उड़ने के तथा सांप बिलों के अंदर रहने के अनुकूल होते है । इसी प्रकार कुछ पौधे मरूस्थलों में उगते है तो कुछ वृक्ष केवल सदाबहार जंगलों में ही मिलते है । जीवों की इसी विशेषता को अनुकूलन ( Adaptability ) कहते है ।

    9 . उद्दीपन ( Irritability ) - जीवधारियों में उत्तेजनशीलता होती है , जिसके कारण वे वातावरण के अंदर होने वाले परिवर्तनों को जान लेते है । गर्म - ठंडे व अच्छे - बुरे उद्दीपनों के कारण जीवधारियों के अंगों में गति होती है । उदाहरण के लिए - सर्दी लगने पर मनुष्य के बाल खड़े हो जाते है और चिड़ियाँ अपने पंख फुला लेती है । इसी प्रकार , अंधेरे कमरे में उगने वाला पौधा प्रकाश - स्त्रोत की दिशा में वृद्धि करता है ।

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  • 10 . जीवद्रव्य ( Protoplasm ) - सभी जीव , चाहे वे प्राणी हो या पौधे . कोशिकाओं के द्वारा निर्मित होते है तथा इन कोशिकाओं के अंदर जीवद्रव्य उपस्थित होता है । हक्स्ले ( Huxley ) ने जीवद्रव्य को ' जीवन का भौतिक आधार ' ( Physical Basis of Life ) कहा है । जीवद्रव्य का रासायनिक संगठन सभी जीवयारियों में लगभग समान होता है । कार्बन , हाइड्रोजन , नाइट्रोजन व ऑक्सीजन इसके मुख्य घटक है ।

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  • 11 . विभेदीकरण ( Differentiation ) - प्रत्येक बहुकोशिक जीव में अलग - अलग प्रकार की जैविक क्रियाओं के लिए विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के समूह होते है । भ्रूणीय एक कोशिक अवस्था से इन विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं का निर्माण ही विभेदन कहलाता है । उदाहरण के लिए - जन्तुओं में पेशीय व अस्थि कोशिकाओं तथा पादपों में मृदोतक , स्थूलकोण कोशिकाएँ आदि ।

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